रायपुर। हाल ही में छत्तीसगढ़ जनसंपर्क संचनालय में घटी मारपीट की घटना ने सत्ता, प्रशासन और पत्रकारिता – तीनों के रिश्तों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रमुख और नामचीन अखबारों ने इस घटना को कुछ इस तरह की सुर्खियों में पेश किया_पत्रकारिता के नाम पर गुंडागर्दी। जनसंपर्क अधिकारी पर किया हमला। लेकिन क्या यही पूरी सच्चाई है?
वीडियो और एफ़आईआर दोनों सोशल मीडिया पर मौजूद असिस्टेंट प्रोफेसर और सामाजिक कार्यकर्ता अकील अहमद अंसारी ने अपने फेसबुक वॉल पर इस घटना पर विस्तृत विश्लेषण साझा किया है। लेखक ने स्पष्ट किया है कि वीडियो की प्रमाणिकता की पुष्टि वे नहीं करते, परंतु स्वयं अपर संचालक संजीव तिवारी द्वारा दर्ज एफ़आईआर में जो लिखा गया है, वही वीडियो में साफ़ दिखाई देता है। एफ़आईआर के अनुसार “मैं अपनी सीट से उठकर उन्हें कक्ष से बाहर निकालने की कोशिश की…यानी विभागीय अधिकारी ने यह स्वीकार किया कि उन्होंने स्वयं शारीरिक बल का प्रयोग किया।
वीडियो में दिखी घटनाक्रम की सच्चाई_वीडियो में साफ़ दिखाई देता है कि काला शर्ट पहना व्यक्ति संजीव तिवारी के कक्ष में शालीनता से प्रवेश करता है। न तो वह अपशब्द कहता है, न तोड़फोड़ करता है। तभी अधिकारी तिवारी अचानक कुर्सी से उठकर उसका गला पकड़ते हैं, और बाहर निकालने का प्रयास करते हैं। इस दौरान दूसरा युवक बीच-बचाव करता है, और जब तक उसका साथी छुड़ नहीं जाता, वह सेल्फ-डिफेंस में तिवारी का गला पकड़ता है। कुछ सेकंड बाद वह तिवारी को छोड़ देता है। यह पूरा दृश्य भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 35 के अंतर्गत “जीवन रक्षा में किया गया बल प्रयोग अपराध नहीं है” के सिद्धांत से मेल खाता है।
एफ़आईआर और पुलिस कार्रवाई पर सवाल
एफ़आईआर में स्वयं संजीव तिवारी ने लिखा है_बुलंद छत्तीसगढ़ समाचार के संपादक मनोज पांडे कक्ष में आए और विषय पर चर्चा करने लगे। कहीं भी मनोज पांडे पर मारपीट या अभद्रता का आरोप नहीं है। फिर भी 10 अक्टूबर 2025 की रात 1:37 बजे, बिना वारंट पुलिस ने मनोज पांडे के घर का गेट तोड़ा, 8–10 लोगों के साथ ज़बरदस्ती प्रवेश किया और CCTV का DVR जब्त कर लिया।
प्रश्न यह है 1. जब एफ़आईआर “चार अज्ञात व्यक्तियों” के खिलाफ थी, तो पुलिस मनोज पांडे के घर क्यों गई? 2. क्या उनके पास वारंट था? 3. जब कोई गंभीर अपराध या जान का खतरा नहीं था, तो CrPC की धारा 165, 149 के तहत तलाशी का औचित्य क्या था? 4. घर में महिलाएँ थीं — तो महिला पुलिस क्यों नहीं थी?
सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों का उल्लंघन डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल (Supreme Court, 1997) के अनुसार, किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी या घर में तलाशी के दौरान यदि पुलिसकर्मी सिविल ड्रेस में हों, नाम-प्लेट न लगी हो या वारंट न हो तो यह संविधान और मानवाधिकारों का उल्लंघन माना जाएगा। ऐसे में यह छापा “कानून के दायरे से बाहर” था। क्या यह “शासकीय कार्य में बाधा” थी? एफ़आईआर में कहा गया है कि अधिकारी “वरिष्ठ पत्रकार पवन दुबे” से चर्चा कर रहे थे।
प्रश्न यह उठता है क्या किसी पत्रकार से चर्चा करना “शासकीय कार्य” है? वीडियो में कहाँ कोई “अपशब्द” या “तोड़फोड़” दिखती है? फिर “शासकीय कार्य में बाधा” की धारा कैसे लगाई गई? यदि कोई अन्य वीडियो या प्रमाण है, तो विभाग को उसे सार्वजनिक करना चाहिए। असली अपराध कौन सा है? यदि कथित पत्रकार ब्लैकमेलिंग में लिप्त हैं — तो कानून उन्हें दंडित करे। लेकिन एक अधिकारी द्वारा गला दबाने, धक्का देने और मारपीट करने का अपराध भी उतना ही गंभीर है।
संजीव तिवारी पर निम्न धाराएँ बनती हैं, धारा 323 – स्वेच्छा से चोट पहुँचाना। धारा 352 – बिना उकसावे के हाथापाई।धारा 504 – जानबूझकर अपमान।धारा 166, 166A – पद का दुरुपयोग और कर्तव्य का उल्लंघन। धारा 307 – हत्या का प्रयास (यदि चोट गंभीर हो) साथ ही, दो दशक से अधिक समय से एक ही पद पर बने रहना भी स्थानांतरण नीति का स्पष्ट उल्लंघन है।
महिलाओं से अभद्रता का पहलू यदि पुलिस ने बिना वारंट घर में प्रवेश किया, DVR छीना, और महिलाओं के साथ अभद्रता की तो यह निम्न धाराओं के तहत अपराध है, धारा 452 – घर में घुसकर हमला, धारा 354 – महिला की गरिमा का अपमान, धारा 34 – सामूहिक अपराध, इस पर विभागीय और न्यायिक जांच आवश्यक है।
कॉरपोरेट मीडिया की चुप्पी_सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि कई प्रमुख अखबारों ने पूरा वीडियो देखने के बावजूद, केवल दो दृश्य चुनकर प्रकाशित किए, ताकि अधिकारी का पक्ष मज़बूत और पत्रकारों की छवि धूमिल की जा सके। यही “कॉरपोरेट पत्रकारिता” की असली तस्वीर है, जहाँ सच नहीं, विज्ञापन तय करते हैं कि कौन अपराधी है और कौन पीड़ित।
अंतिम सवाल_क्या आज पत्रकारों की आवाज़ दबाने का नया तरीका यही है, झूठी एफआईआर, आधी-अधूरी खबरें और सत्ता के दबाव में बर्बर कार्रवाई? क्या कानून अब सिर्फ “बड़े अफसरों की सुरक्षा कवच” बन चुका है?और क्या इस घटना के बाद आम नागरिक भी यह मान ले कि सत्ता के सामने सच बोलना सबसे बड़ा अपराध है”?
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(यह लेख असिस्टेंट प्रोफेसर एवं सामाजिक कार्यकर्ता अकील अहमद अंसारी के फेसबुक पोस्ट पर आधारित है। मूल स्रोत का लिंक ऊपर दिया गया है।)


