Saturday, 7 Mar 2026

आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं ने पीएम और सीएम से लगाई न्याय की गुहार

 

महासमुंद। छत्तीसगढ़ की एक लाख से अधिक आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएं आज अपने 50 वर्षों की सेवा यात्रा को लेकर सम्मान और अधिकार की मांग कर रही हैं। अपने अनुभव, समर्पण और पीड़ा को शब्दों में पिरोकर उन्होंने देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राज्य के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को संयुक्त पत्र प्रेषित किया है, जिसमें उन्होंने शासकीय कर्मचारी का दर्जा, मानदेय वृद्धि और तकनीकी जटिलताओं से मुक्ति की मांग की है।

आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का यह संघर्ष उस योजना से जुड़ा है जिसकी नींव 2 अक्टूबर 1975 को रखी गई थी — एकीकृत बाल विकास सेवा (ICDS)। तब से लेकर आज तक ये कार्यकर्ता पोषण, स्वास्थ्य, शिक्षा, टीकाकरण जैसी योजनाओं को गांव-गांव, घर-घर पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती आ रही हैं। लेकिन आज 5 दशकों बाद भी, वे न शासकीय कर्मचारी हैं, न मान्यता प्राप्त श्रमिक। महज 10 हजार प्रति माह (कार्यकर्ता) और 5 हजार प्रति माह (सहायिका) का मानदेय उन्हें मिलता है, जो वर्तमान महंगाई के दौर में न्यूनतम जीवनयापन के लिए भी अपर्याप्त है।

प्रमुख मांगें क्या हैं?

आंगनबाड़ी कार्यकर्ता को ₹26,000 और सहायिका को ₹22,100 मासिक मानदेय। शासकीय कर्मचारी का दर्जा। सामाजिक सुरक्षा, पेंशन, बीमा और चिकित्सा सुविधा। कार्य प्रणाली को डिजिटल से पुनः ऑफलाइन करने की मांग (FRS, e-KYC, फेस कैप्चर से मुक्ति)।

केंद्र और राज्य सरकार के बीच टालमटोल की नीति को समाप्त करने की अपील।

पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि पूर्व में जब-जब उन्होंने अपनी मांगें उठाईं, तब-तब राज्य और केंद्र एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते रहे। लेकिन अब जबकि दोनों जगह एक ही दल की सरकार है, तो उन्हें आशा है कि यह संवेदनशील मुद्दा अब टालमटोल नहीं, बल्कि ठोस निर्णय पाएगा।

यह अभियान अब आंदोलन का रूप ले रहा है। राज्यभर की आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएं एकजुट होकर अपने हक की मांग कर रही हैं। महासमुंद ब्लॉक से सुधा रात्रे, सुलेखा शर्मा, हाजरा खान, छाया हिरवानी, अन्नपूर्णा वैष्णव, विभा साव साहू, सुशीला ठाकुर, भारती ठाकुर, सत्यभामा जनक, नंदिनी, सुनीता चौधरी, सीमा बंदे, धनमती बघेल, अहिल्या मरकाम, रागिनी चंद्राकर, अंजू चंद्राकर, रूपा भारती, विमला सोनी, सुल्ताना बानो, भुवनेश्वरी ध्रुव, पुष्पा साहू, शैल साहू और सायर खान जैसी महिलाओं ने इस आंदोलन को नई ऊर्जा दी है।

पत्र के माध्यम से उन्होंने नारी शक्ति को सशक्त बनाने की दिशा में सरकार की प्रतिबद्धता को याद दिलाते हुए कहा कि —यह मात्र एक आवेदन नहीं, बल्कि हमारी लंबी सेवा की पीड़ा, समर्पण और अब सम्मान पाने की आकांक्षा की आवाज है।”

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