1. “सुप्रीम कोर्ट से भी हारे मग्गू सेठ, अब कब होगी गिरफ्तारी?”
2. “23 हेक्टेयर बेनामी ज़मीन और अपराधों का इतिहास – मग्गू सेठ का खेल खत्म?”
3. “लोवर से सुप्रीम कोर्ट तक हर स्तर पर हारे मग्गू सेठ, लेकिन पुलिस खामोश क्यों?”
नई दिल्ली/रायपुर/बलरामपुर। छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्रों में ज़मीन घोटाले, पुलिस-राजनीतिक गठजोड़ और संगठित अपराध के आरोपों में घिरे कुख्यात कारोबारी विनोद कुमार अग्रवाल उर्फ़ मग्गू सेठ को देश की सर्वोच्च अदालत से भी बड़ा झटका लगा है। 7 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने उनकी स्पेशल लीव पिटीशन (SLP) को खारिज कर दिया, जिससे हाई कोर्ट का फैसला बरकरार रहा और गिरफ्तारी का रास्ता साफ हो गया।
लोवर कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक हार की लड़ी
ट्रायल कोर्ट – निचली अदालत में मग्गू सेठ की याचिकाएँ गवाहों और सबूतों के सामने टिक नहीं सकीं।
हाई कोर्ट – 1 जुलाई 2025 को बिलासपुर हाई कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट का आदेश सही है और अग्रवाल को कोई राहत नहीं दी जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट – 7 अगस्त को जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की बेंच ने संक्षिप्त सुनवाई के बाद कहा—
“कोई विशेष कारण नहीं है कि हम विशेष अनुमति दें”—और SLP खारिज कर दी।
मग्गू सेठ का आपराधिक इतिहास
2009 से 2024 तक उनके खिलाफ दर्ज कई प्रकरण—क्रेशर हत्याकांड (2022) – संलिप्तता और जांच में बाधा डालने के आरोप। पहाड़ी कोरवा शिकायत (2024) – फर्जी रजिस्ट्री और ₹14 लाख के चेक के जरिए धोखाधड़ी। थाना राजपुर – अपराध क्रमांक 48/09 (मारपीट), 133/15 (अपहरण), 40/16, 120/16, 07/17 (SC/ST उत्पीड़न) सहित कई केस। चौकी बरियों – अपराध क्रमांक 32/18, 34/21 (लापरवाही से मृत्यु), 85/21 (बंधक बनाना) सहित प्रकरण। इतनी गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि के बावजूद ज़िला बदर की कार्रवाई अटकाई गई, जिससे स्थानीय लोगों में सवाल उठे कि पुलिस-प्रशासन “नकदी दबाव” में फाइल दबा रहा था?
कमला देवी/रीझन/नगेसिया के नाम पर बेनामी ज़मीन
ग्राम भेसकी (जनपद पंचायत राजपुर, बलरामपुर) में ही कमला देवी के नाम पर 50 से अधिक प्लॉट, कुल 23.54 हेक्टेयर भूमि खरीदी गई है। खसरा नंबरों की लंबी सूची से साफ है कि यह नेटवर्क एक बड़े पैमाने की फर्जी खरीद-फरोख्त और बेनामी संपत्ति का खेल है।लोगों का आरोप है कि ज़मीन का यह खेल पूरे जिले ही नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के अन्य हिस्सों तक फैला हुआ है।
मुख्य आरोप_आदिवासियों (कोरवा/पंडो समुदाय) और राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र की ज़मीन पर कब्ज़ा। फर्जी रजिस्ट्री और बेनामी संपत्ति का जाल। पुलिस, राजस्व अधिकारियों और दलालों से मजबूत गठजोड़। पीड़ित परिवारों को न्याय से वंचित करने के लिए राजनीतिक दबाव।
अब आगे क्या? सुप्रीम कोर्ट से हार के बाद अब गिरफ्तारी का रास्ता साफ है।
लेकिन लोग सवाल पूछ रहे हैं_ “इतने सबूत और कोर्ट के फैसले के बाद भी अगर पुलिस कार्रवाई में देर करती है तो इसका मतलब यही होगा कि कहीं न कहीं डील चल रही है।” यह पूरा मामला छत्तीसगढ़ में आदिवासी भू-अधिकार, कानून व्यवस्था और प्रशासन की निष्पक्षता की सबसे बड़ी कसौटी बन चुका है।



