खनिज विभाग–प्रशासन की चुप्पी पर सवाल, स्थानीय जनप्रतिनिधियों की भूमिका भी संदेह के घेरे में
गरियाबंद। प्रदेश में अवैध रेत खनन पर सख्ती के स्पष्ट निर्देश मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय द्वारा दिए जा चुके हैं, इसके बावजूद गरियाबंद जिले में रेत माफिया बेलगाम नज़र आ रहे हैं। जिले के कुरूशकेरा, बोरिद और नागझर क्षेत्रों में 24 घंटे अवैध रेत की निकासी धड़ल्ले से जारी है, जो सीधे-सीधे खनिज विभाग और जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
सूत्रों के अनुसार, इन रेत घाटों से प्रतिदिन सैकड़ों ट्रैक्टर और हाइवा अवैध रूप से रेत का परिवहन कर रहे हैं। यह सब बिना वैध अनुमति, बिना पर्यावरणीय स्वीकृति और बिना किसी रोक-टोक के हो रहा है। आश्चर्य की बात यह है कि खनिज विभाग और प्रशासन की ओर से न तो नियमित निरीक्षण दिखता है और न ही प्रभावी कार्रवाई।
इस अवैध कारोबार से राज्य के राजस्व को करोड़ों रुपये का नुकसान हो रहा है, वहीं नदी-नालों का प्राकृतिक संतुलन भी बिगड़ रहा है। पर्यावरण को हो रहे नुकसान की अनदेखी कर कुछ रसूखदार लोग अपनी जेबें भरने में लगे हुए हैं।
स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि कुछ जनप्रतिनिधियों और उनके करीबी लोगों की मिलीभगत के बिना इस पैमाने पर अवैध खनन संभव नहीं है। प्रशासनिक संरक्षण और राजनीतिक दबाव के चलते रेत माफियाओं के हौसले बुलंद हैं। यही कारण है कि कार्रवाई के नाम पर कभी-कभार दिखावटी कदम उठाए जाते हैं, लेकिन अवैध खनन का कारोबार बदस्तूर जारी रहता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब मुख्यमंत्री स्वयं अवैध रेत खनन पर सख्ती की बात कर रहे हैं, तो गरियाबंद जिले में उनके निर्देशों को आखिर क्यों और किसके संरक्षण में नजरअंदाज किया जा रहा है? क्या खनिज विभाग और जिला प्रशासन अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ चुके हैं, या फिर इस अवैध धंधे में उनकी मौन सहमति शामिल है?
अब जरूरत है कि प्रदेश सरकार इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराए, दोषी अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और रेत माफियाओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई करे। जब तक जिम्मेदारों पर कठोर कदम नहीं उठाए जाएंगे, तब तक अवैध रेत का यह खेल यूं ही चलता रहेगा और सरकारी खजाने के साथ-साथ प्रकृति का भी नुकसान होता रहेगा।


