महासमुंद। छत्तीसगढ़ में रिकॉर्ड तोड़ धान खरीदी के सरकारी दावों के बीच अन्नदाताओं की आंखों में आंसू हैं। जिले में सैकड़ों किसान ऐसे हैं जिनकी मेहनत से तैयार फसल समर्थन मूल्य पर बिकने के बजाय कोचियों के हाथों ओने-पौने दामों पर बिक रही है या घरों में सड़ने को मजबूर है। वजह? मृत भूमिस्वामी के नाम पर अटके राजस्व रिकॉर्ड और एग्रीस्टैक पोर्टल की नई व्यवस्था, जो उत्तराधिकार अपडेट न होने से किसानों की कमर तोड़ रही है।
सरकार धान खरीदी के आंकड़े गिना रही है, लेकिन वास्तविक किसानों की यह पीड़ा कौन देखेगा? राज्य में धान उपार्जन रिकॉर्ड स्तर पर चल रहा है, महासमुंद जिला तो सबसे आगे है, मगर इन गरीब अन्नदाताओं का जीना मुहाल हो गया है। राजस्व और खाद्य विभाग के बीच तालमेल की कमी, एग्रीस्टैक की तकनीकी खामियां और उत्तराधिकार अपडेट की सुस्ती ने किसानों को हताश कर दिया है।
ग्राम पीढ़ी के किसान पुरुषोत्तम सोनकर की कहानी किसी भी संवेदनशील इंसान का दिल दहला देगी। उनके पिता पवन कुमार सोनकर की मौत 6 दिसंबर 2024 को हुई। तब से पुरुषोत्तम अपनी 1.03 हेक्टेयर जमीन (पटवारी हल्का नं. 3, रा.नि.मं. सिरपुर, ऋण पुस्तिका क्रमांक पी-2410514) पर खेती कर रहे हैं। इस साल कर्ज लेकर मेहनत की, अच्छी धान की फसल तैयार हुई, लेकिन रिकॉर्ड अभी भी मृत पिता के नाम पर अटका है। एग्रीस्टैक पोर्टल पर केरी फॉरवर्ड नहीं हुआ, वारिसान नाम दर्ज नहीं हुआ। नतीजा – समर्थन मूल्य पर धान बेचने का रास्ता बंद!
पुरुषोत्तम के अलावा उनके भाई सत्यम, ललित और मां चमेली व गीता विधिक वारिस हैं। परिवार ने कलेक्टर जनदर्शन में आवेदन दिया, जन चौपाल के चक्कर काटे, लेकिन दो महीने बीत गए – कोई सुनवाई नहीं। आंसू पोंछते हुए पुरुषोत्तम कहते हैं, “पिता की मौत के बाद हमने खेती की, कर्ज लिया, फसल उगाई। अब धान तैयार है, बेच नहीं पा रहे। कर्ज कैसे चुकाएंगे? बच्चे कैसे पढ़ाएंगे? शासन किसानों की बात करता है, लेकिन हम जैसे सैकड़ों परिवार भूखों मरने की कगार पर खड़े हैं।
यह कोई इकलौत्ता मामला नहीं। महासमुंद जिले में सैकड़ों किसान मृत भूमिस्वामी के नाम अटके रिकॉर्ड की मार झेल रहे हैं। किसान जनप्रतिनिधियों और प्रशासन के दरवाजे खटखटा रहे हैं, लेकिन आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिल रहा।
गौरतलब है कि मृत्यु के बाद वारिसान रिकॉर्ड अपडेट करने में इतनी देरी क्यों? पटवारी और तहसीलदारों की जवाबदेही क्यों नहीं तय की जा रही? एग्रीस्टैक जैसी नई डिजिटल व्यवस्था लागू करने से पहले ऐसे संवेदनशील मामलों की स्क्रीनिंग क्यों नहीं हुई? तकनीकी खामियां पहले से क्यों नहीं दूर की गईं? धान खरीदी सीजन शुरू होने से पहले इन समस्याओं का समाधान क्यों नहीं निकाला गया? क्या सरकार को किसानों की फसल सड़ने का इंतजार था? रिकॉर्ड खरीदी के आंकड़े तो गिने जा रहे हैं, लेकिन उत्तराधिकार अपडेट न होने से वंचित रहे किसानों की संख्या का हिसाब कौन रखेगा? कलेक्टर जनदर्शन और जन चौपाल में आवेदन देने के बावजूद महीनों देरी क्यों? क्या प्रशासनिक सुस्ती के लिए कोई जिम्मेदार नहीं? राज्य सरकार किसान हितैषी होने का दावा करती है, तो इन हताश अन्नदाताओं की पीड़ा दूर करने के लिए तत्काल विशेष अभियान क्यों नहीं चलाया जा रहा? क्या डिजिटल इंडिया का मतलब गरीब किसानों को सरकारी फाइलों और पोर्टलों की चक्की में पीसना है?


