Saturday, 5 Sep 2026

एक ही तबादले के लिए प्रभारी मंत्री को लिखने पड़े दो पत्र, अब अपर कलेक्टर रवि साहू के दावों पर उठे सवाल

पहले फाइल प्रस्तुत नहीं होने की बात, दूसरी अनुशंसा के बाद जारी हुआ आदेश; दस्तावेजों ने खड़े किए कई सवाल

महासमुंद। महासमुंद जिले में एक पटवारी के स्थानांतरण को लेकर प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मामला केवल एक कर्मचारी के तबादले का नहीं, बल्कि इस बात का है कि आखिर भारतीय जनता पार्टी की सरकार होने के बावजूद जिले के प्रभारी मंत्री को एक स्थानांतरण के लिए दो-दो बार अनुशंसा पत्र क्यों लिखना पड़ा? इससे भी बड़ा सवाल अपर कलेक्टर रवि साहू द्वारा मीडिया के समक्ष दी गई उस जानकारी को लेकर उठ रहा है, जिसमें कथित तौर पर कहा गया था कि संबंधित स्थानांतरण की फाइल कलेक्टर के समक्ष प्रस्तुत नहीं की गई थी।

उपलब्ध दस्तावेजों और समाचार पत्र में प्रकाशित खबर के अनुसार, प्रभारी मंत्री की अनुशंसा के बाद संबंधित पटवारी के स्थानांतरण की प्रक्रिया शुरू हुई थी। समाचार पत्र की कटिंग में अपर कलेक्टर रवि साहू का बयान प्रकाशित है, जिसमें उन्होंने कहा था कि संबंधित व्यक्ति ने उनसे मिलकर अपनी समस्या बताई थी, लेकिन स्थानांतरण की फाइल कलेक्टर के समक्ष मंजूरी के लिए प्रस्तुत नहीं की गई है।

अब इस पूरे मामले में नया मोड़ तब आया है, जब प्रभारी मंत्री की दूसरी अनुशंसा के बाद संबंधित पटवारी मनोज कुमार मंडावी के स्थानांतरण का आदेश जारी हो गया। 2 सितंबर 2026 को जारी आदेश में मनोज कुमार मंडावी, पटवारी, हल्का क्रमांक 45 को तहसील बसना से स्थानांतरित कर तहसील महासमुंद में अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) महासमुंद के विकल्प पर पदस्थ किया गया है। यह आदेश कलेक्टर महासमुंद की अनुमति से जारी किया गया है और इस पर अपर कलेक्टर रवि कुमार साहू के डिजिटल हस्ताक्षर हैं।

यहीं से पूरे घटनाक्रम पर सवाल खड़े होते हैं। यदि प्रभारी मंत्री की पहली अनुशंसा के बाद संबंधित फाइल कलेक्टर के समक्ष प्रस्तुत नहीं की गई थी, तो इसके पीछे आखिर क्या कारण था? क्या एक प्रभारी मंत्री की अनुशंसा भी जिला प्रशासन में किसी कर्मचारी के स्थानांतरण के लिए पर्याप्त नहीं थी? और जब दूसरी बार अनुशंसा की गई, तभी फाइल कलेक्टर के समक्ष क्यों पहुंची और आदेश इतनी जल्दी कैसे जारी हो गया?

समाचार पत्र में प्रकाशित जानकारी के अनुसार, प्रभारी मंत्री की अनुशंसा पर आवेदन 28 जुलाई को अपर कलेक्टर रवि साहू को सौंपा गया था। इसके बाद 31 जुलाई को जिले में दो स्थानांतरण आदेश जारी हुए, लेकिन संबंधित पटवारी का स्थानांतरण नहीं किया गया। इस दौरान अन्य पटवारियों के स्थानांतरण आदेश जारी होने और संबंधित प्रकरण लंबित रहने से प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल और गहराते गए।

सबसे गंभीर प्रश्न अपर कलेक्टर रवि साहू की भूमिका को लेकर है। मीडिया को यह जानकारी दी गई कि स्थानांतरण की फाइल कलेक्टर के समक्ष प्रस्तुत नहीं की गई है, जबकि अब दूसरी अनुशंसा के बाद उसी प्रकरण में कलेक्टर की अनुमति से आदेश जारी हो चुका है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि पहली अनुशंसा के बाद फाइल आगे क्यों नहीं बढ़ाई गई? क्या फाइल जानबूझकर रोकी गई थी, या फिर प्रभारी मंत्री की पहली अनुशंसा को गंभीरता से नहीं लिया गया?

भारतीय जनता पार्टी की सरकार में उसी पार्टी के प्रभारी मंत्री को एक सामान्य प्रशासनिक स्थानांतरण के लिए दो बार पत्र लिखना पड़े, यह स्थिति अपने आप में प्रशासनिक व्यवस्था पर बड़ा सवाल है। आखिर ऐसी कौन-सी बाधा थी, जिसके कारण पहली अनुशंसा के बाद काम नहीं हुआ और दूसरी अनुशंसा के बाद तत्काल फाइल कलेक्टर तक पहुंच गई?

अब इस पूरे मामले में जिला प्रशासन को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। अपर कलेक्टर रवि साहू को भी सार्वजनिक रूप से यह बताना चाहिए कि पहली अनुशंसा के बाद फाइल कलेक्टर के समक्ष क्यों प्रस्तुत नहीं की गई और मीडिया को दी गई जानकारी तथा बाद में जारी आदेश के बीच उत्पन्न विरोधाभास की वास्तविक वजह क्या है।

एक स्थानांतरण के पीछे दो अनुशंसा पत्र और फिर बदला हुआ प्रशासनिक रुख—महासमुंद में यह मामला अब केवल तबादले का नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही और कार्यप्रणाली का सवाल बन गया है।

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