Saturday, 7 Mar 2026

अपनी ही ज़मीन का धान नहीं बेच पा रहा किसान,  समर्थन मूल्य पर खरीदी से वंचित, कलेक्टर जनदर्शन में लगाई न्याय की गुहार

महासमुंद। जिले के बसना तहसील के ग्राम ठाकुरपाली निवासी गरीब किसान सुदामा प्रधान ने अपनी ही भूमि पर बोए गए धान को बेचने के अधिकार के लिए शासन-प्रशासन से न्याय की गुहार लगाई है। पत्नी और बच्चों के साथ कलेक्टर जनदर्शन पहुंचे सुदामा प्रधान ने बताया कि उन्होंने कई बार तहसील बसना और एसडीएम कार्यालय में आवेदन दिया, लेकिन अब तक किसी भी स्तर पर कोई समाधान नहीं हुआ है।

गौरतलब है कि ग्राम अखराभांठा (तु.प.ह.नं. 44, रा.नि.मं. गढ़फुलझर) में स्थित खसरा नंबर 144, रकबा 4.470 हेक्टेयर भूमि एक शामिल शरीक खाता है, जिसमें आवेदक सुदामा प्रधान और उनके भाई दुखीश्याम प्रधान का नाम दर्ज है।

सुदामा प्रधान का कहना है कि ज़मीन का आपसी हिस्सा-बंटवारा पहले ही हो चुका है, परंतु भाई द्वारा राजस्व रिकॉर्ड में खाता विभाजन नहीं कराया जा रहा है। इसके बावजूद वह अकेले ही कृषि ऋण प्राप्त कर रहा है, धान विक्रय कर रहा है और फसल का पूरा लाभ स्वयं ले रहा है।

किसान सुदामा प्रधान ने कहा कि उन्होंने अपनी हिस्से की भूमि में धान की फसल बोई है, लेकिन खाता विभाजन न होने के कारण समिति द्वारा उनका धान खरीदी सूची में स्वीकार नहीं किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि अब जबकि राज्य सरकार द्वारा समर्थन मूल्य पर धान खरीदी की प्रक्रिया शुरू होने वाली है, उन्हें अपनी मेहनत की उपज बेचने का अधिकार नहीं मिल पा रहा है।

छत्तीसगढ़ सरकार के स्पष्ट नियमों के अनुसार “जिस किसान ने जिस भूमि में धान की फसल बोई है, वही किसान उस भूमि का धान समर्थन मूल्य पर बेचने का अधिकारी होगा।”

लेकिन इस प्रकरण में, प्रशासनिक अधिकारी इस नियम को दरकिनार कर रहे हैं और पीड़ित किसान को कोई सहायता नहीं दे रहे हैं। बसना तहसील और एसडीएम कार्यालय के सैकड़ों चक्कर लगाने के बावजूद आवेदक को न तो खाता विभाजन मिला और न ही धान विक्रय की अनुमति।

आवेदक ने बताया कि ग्राम पंचायत ठाकुरपाली से भी कोई राहत नहीं मिली। उन्होंने आरोप लगाया कि अनावेदक का मनोबल इतना बढ़ गया है कि वह स्थानीय अधिकारियों को भी प्रभावित कर रहा है, जिसके कारण एक गरीब परिवार अपनी ही भूमि पर उगाई फसल का लाभ नहीं उठा पा रहा है।

शासन की जवाबदेही पर सवाल_ यह मामला न केवल एक किसान के संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा है, बल्कि यह दर्शाता है कि राजस्व व्यवस्था की लापरवाही और स्थानीय प्रशासन की उदासीनता किस प्रकार से सरकार की जनकल्याणकारी नीतियों को कमजोर कर रही है। जब किसान अपनी ही ज़मीन का धान शासन के समर्थन मूल्य पर नहीं बेच पा रहा है, तो यह “धान खरीदी में पारदर्शिता” के सरकारी दावों पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

पीड़ित सुदामा प्रधान ने जिला प्रशासन से मांग की है कि पूर्व में हुए हिस्से-बंटवारे के आधार पर खाता विभाजन तत्काल कराया जाए, मकान का हिस्सा बंटवारा सुनिश्चित किया जाए, और धान विक्रय का लाभ उक्त भूमि के वास्तविक काश्तकार को मिले, ऐसी व्यवस्था की जाए।

 

 

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