महासमुंद। पिथौरा तहसील के ग्राम जंघोंरा में मूसलाधार बारिश ने गरीब बालाराम चौहान का कच्चा मकान ढहा दिया। हादसे को 48 घंटे बीत चुके हैं लेकिन जिला प्रशासन और स्थानीय अधिकारी अब तक राहत पहुंचाने नहीं पहुंचे। सवाल यह है कि जब आम जनता पर विपदा आती है तो सरकारी तंत्र आंखें मूंदकर क्यों बैठा रहता है?
बालाराम चौहान, जो मेहनत-मज़दूरी कर किसी तरह अपने परिवार का गुजारा कर रहा है, आज अपनी पत्नी साधनी, बेटी खिलेश्वर और बेटे रेखराम के साथ खुले आसमान तले जिंदगी गुजारने को मजबूर है। बरसात के बीच टूटी-फूटी दीवारों के सहारे रहने की मजबूरी किसी भी वक्त बड़ा हादसा करा सकती है।
गांव वालों ने मदद के लिए प्रशासन से गुहार लगाई, लेकिन अफसरों का रवैया “जैसे कुछ हुआ ही नहीं” वाला है। नौकरशाह अपनी एयरकंडीशन दफ्तरों में बैठकर जनता के टैक्स के पैसों से तनख्वाह तो समय पर ले रहे हैं, लेकिन उन्हीं पैसों से जीवन काट रहे गरीब की दुर्दशा पर आंख मूंदे हुए हैं।
हैरानी की बात है कि यह वही जिला प्रशासन है जो योजनाओं और राहत कार्यों के कागजी आंकड़ों में अपनी पीठ थपथपाता नहीं थकता। मगर जमीनी हकीकत यह है कि जब किसी गरीब का आशियाना ढहता है तो प्रशासनिक अमला मौके पर पहुंचने की भी जहमत नहीं उठाता।
इस बीच कुछ समाजसेवी जरूर आगे आए हैं, जिन्होंने अपने स्तर पर परिवार की मदद करने की कोशिश की है। लेकिन सवाल बड़ा है — जब तक अधिकारियों की नींद नहीं खुलेगी, तब तक ऐसे गरीब परिवारों की किस्मत कब तक केवल “फोटो खिंचवाने वाले राहत कार्यों” की शिकार होती रहेगी?


