Saturday, 7 Mar 2026

डीएमएफ के 2 करोड़ रुपए आए एक साल हो गए, स्प्रेयर आज तक नहीं पहुंचे खेतों में!  

महासमुंद। जिला खनिज न्यास (DMF) फंड से किसानों को बैटरी एवं हैंड ऑपरेटेड नेपसैक स्प्रेयर देने के नाम पर खुला खेल चल रहा है। 22 नवंबर 2024 को स्वीकृत 1.99 करोड़ रुपए (कुल 1,99,98,720 रुपए) में से पहली किस्त के 80 लाख रुपए कृषि विभाग के खाते में आए एक पूरा साल बीत गया, लेकिन एक भी स्प्रेयर किसानों तक नहीं पहुंचा। पूर्व पार्षद पंकज साहू ने कृषि विभाग के अधिकारियों व स्थानीय जनप्रतिनिधियों पर सीधा आरोप लगाया है कि “कमीशन का मोटा खेल और बैंक में पड़े पैसे का ब्याज हड़पने के लिए जान-बूझकर वितरण रोका जा रहा है।” पंकज साहू ने बताया कि DMF से आई राशि पिछले एक साल से कृषि विभाग के खाते में पड़ी है। इतनी बड़ी राशि पर मिलने वाला ब्याज की रकम लाखों में है। उनका सवाल है – “यह ब्याज कौन खा रहा है? किसान तो आज भी बाजार से 8-10 हजार रुपए खर्च कर स्प्रेयर खरीदने को मजबूर हैं।

साहू का दावा है कि स्प्रेयर की खरीदी जान-बूझकर नहीं की जा रही, क्योंकि “कुछ चुनिंदा सप्लायरों को मोटा कमीशन देना तय है।” जब तक मनमाफिक कमीशन नहीं मिलता, टेंडर प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ाई जा रही। नतीजा – योजना फाइलों में कैद, किसान खेतों में परेशान।साहू ने स्थानीय विधायक पर भी तीखा हमला बोला – “विधायक जी को DMF फंड की एक रुपए की जानकारी तक लेना मुनासिब नहीं लगा। एक बार भी कृषि अधिकारियों से पूछताछ नहीं की कि पैसा आया कहाँ और स्प्रेयर गए कहाँ? जब जनप्रतिनिधि ही चुप हैं तो अधिकारी मनमानी करेंगे ही।”

जिले के कई गांवों के किसानों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि फसल में कीटनाशक छिड़कने का मौसम आते-आते स्प्रेयर खत्म हो जाते हैं। मजबूरन महंगे दाम देकर बाजार से खरीदना पड़ता है। एक किसान ने गुस्से में कहा – “DMF हमारी खदानों की रॉयल्टी से आता है, वो पैसा अफसरों की तिजोरी और बैंक में पड़ा सड़ रहा है।”

अब सवाल यह है:

1. एक साल में 2 करोड़ का एक भी स्प्रेयर क्यों नहीं खरीदा गया?

2. 80 लाख की पहली किस्त पर मिला ब्याज कहाँ गया?

3. कमीशन के खेल में कौन-कौन शामिल हैं?

4. कलेक्टर और DMF प्रबंध निकाय इस मामले में कब संज्ञान लेंगे? कृषि विभाग के उप संचालक से बार-बार संपर्क करने की कोशिश की गई, पर उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। किसानों का हक और खदानों की रॉयल्टी का पैसा अब अफसरों-ठेकेदारों की जेब में न जाए, इसके लिए जन जागरण जरूरी है!

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