जांजगीर-चांपा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रायपुर में आयोजित 60वीं डीजीपी–आईजीपी कॉन्फ्रेंस में पुलिस की छवि सुधारने पर जोर दिया। लेकिन जांजगीर-चांपा जिले की वास्तविकता इसके उलट तस्वीर पेश कर रही है। जिले में नौ महीने पहले हुई 78 लाख रुपये की लूट और गोलीकांड अब तक अनसुलझे हैं, जबकि दूसरी ओर खेतों में लाखों के जुआ फड़ खुलेआम संचालित हो रहे हैं। इस स्थिति ने पुलिस की कार्रवाई और व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
पिसौद, पीथमपुर, उदयबन और आसपास के गांवों के खेत जुए के नए अड्डों में बदल चुके हैं। शाम चार बजे के बाद यहां जुआरियों की भीड़ लगने लगती है। ताश की गड्डियाँ खुलती हैं, मोटरसाइकिलों की कतारें लगती हैं और दांव पर लाखों रुपये लगाए जाते हैं। यह गतिविधियां वर्षों से जारी हैं और पुलिस की गश्त के बावजूद कम होने के बजाय लगातार बढ़ रही हैं।
हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें खेतों में चल रहे जुआ फड़ का संगठित रूप दिखाई देता है। नोटों का लेन-देन भी वीडियो में साफ नजर आता है। ग्रामीणों का कहना है कि पुलिस के आने से पहले ही फड़ समेट लिए जाते हैं और अगले ही दिन नई जगह फिर से शुरू हो जाते हैं। इस बार-बार बदलते पैटर्न ने जुआ नेटवर्क को पकड़ना चुनौतीपूर्ण बना दिया है, जिससे ग्रामीणों में कानून व्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ गई है।
पुलिस ने विभिन्न स्थानों पर कार्रवाई की है। रमन नगर में छापेमारी के दौरान छह पटवारी सहित आठ जुआरी गिरफ्तार किए गए और करीब 20 लाख रुपये बरामद हुए। पामगढ़, चांपा, पीथमपुर सहित कई क्षेत्रों में जुआरियों को पकड़ा गया। चुनाव के बाद मुलमुला क्षेत्र में फिर से जुआ फड़ सक्रिय हो गए। हालांकि कार्रवाई हुई, लेकिन इसका प्रभाव अस्थायी रहा और जुआ नेटवर्क लगातार फैलता जा रहा है।
14 जनवरी 2025 को सरकारी शराब दुकान के पास बदमाशों ने कलेक्शन टीम पर हमला कर कर्मचारी को गोली मारी और 78 लाख रुपये लूटकर नीली HF डीलक्स मोटरसाइकिल से फरार हो गए। घटना के बाद तत्कालीन एसपी विवेक शुक्ला मौके पर पहुंचे, आईजी ने निरीक्षण किया और कई जिलों में दबिश दी गई। सीसीटीवी फुटेज भी खंगाले गए और संदिग्धों का हुलिया जारी किया गया।
काफी प्रयासों और इनाम बढ़ाकर पांच लाख रुपये घोषित करने के बावजूद नौ महीने बाद भी पुलिस को कोई ठोस सुराग नहीं मिला है। चार महीने तक विवेक शुक्ला जिले के एसपी रहे, बाद में विजय पांडे ने पदभार संभाला, लेकिन दोनों कार्यकाल में कोई महत्वपूर्ण प्रगति नहीं हो सकी। जांच जस की तस है और अपराधियों के फरार रहने से पुलिस की छवि और विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़े हुए हैं।
प्रधानमंत्री द्वारा पुलिस की छवि सुधारने और जनता का विश्वास जीतने का आह्वान महत्वपूर्ण था, लेकिन जांजगीर की जमीनी हकीकत इस सलाह से मेल नहीं खाती। जब बड़े अपराध सुलझ नहीं पाते और छोटे अपराध रुक नहींते, तो पुलिस की छवि जनता के बीच स्वतः ही खराब होती है। केवल गश्त बढ़ाने या पोस्टर लगाने से स्थिति नहीं सुधरेगी।
जांजगीर पुलिस के सामने दो बड़े मोर्चे हैं—पहला, 78 लाख लूटकांड का खुलासा और आरोपी की गिरफ्तारी, और दूसरा, गांव-खेतों में सक्रिय जुआ नेटवर्क का स्थायी खात्मा। जब तक इन दोनों मामलों में निर्णायक और प्रभावी कदम नहीं उठाए जाते, तब तक जनता का भरोसा लौटना मुश्किल है और प्रधानमंत्री द्वारा कही गई ‘छवि सुधार’ की बात भी धरातल पर नहीं उतर पाएगी।


