विजयादशमी विशेष
महासमुंद। आज विजयादशमी के दिन शाम ढलते ही झमाझम बरसात ने पूरे उत्सव का हाल बदल दिया। मैदान सज-धज कर तैयार थे, रामलीला का मंच सजा था, पुतलों में पटाखे भर दिए गए थे, पर पानी ने सारी तैयारियों को यूँ धो दिया जैसे वर्षों से जमा उम्मीदों पर कोई अचानक बौछार पड़ गई हो। नतीजा यह हुआ कि कहीं रावण आधा जला, कहीं उसका धुआँ ही फैल पाया और कहीं तो दर्शक केवल गीली लकड़ियों की दुर्गंध के साथ घर लौट गए।
लोगों ने मज़ाक में कहा कि “रावण जलना था, लेकिन इस बार तो सिर्फ पुतले की नाक बह गई।” मैदान में भीगते हुए बच्चे मिट्टी में कागज़ की नाव तैराते रहे, बुजुर्ग पुराने दिनों को याद कर बड़बड़ाते रहे कि “हमारे ज़माने का दशहरा कुछ और ही हुआ करता था”, और युवा पूरे दृश्य को मोबाइल में कैद कर ‘लाइव’ चलाने में मगन रहे। रावण के जलने से ज्यादा महत्वपूर्ण था कि इंटरनेट पर किसकी रील पहले अपलोड हो जाए।
इस अधूरे दहन और अधूरी लीला ने कहीं न कहीं सच्चाई को और साफ कर दिया। पुतला तो हर साल जलता है, पर बुराई बची रहती है। पड़ोसियों की ईर्ष्या, समाज की चुगली, महंगाई की मार और परंपराओं पर आधुनिकता की चुभन—सब उसी तरह खड़े रहे जैसे गीले पुतले के अंदर बची अधजली लकड़ियाँ।
सोशल मीडिया पर तस्वीरें डाली गईं और कैप्शन बना – “Breaking: रावण अधजला, जनता भीगी।” लोग ठंडी साँस लेकर बोले कि अब अच्छाई-बुराई की असली लड़ाई मैदान में नहीं, बल्कि मोबाइल स्क्रीन पर तय होती है।
बारिश से बेचारों का रावण तो अधजला रह गया लेकिन राजनीति के रावण पूरी तरह सुरक्षित हैं। न भ्रष्टाचार जला, न घोटालों का पुतला सुलगा, न झूठे वादों की भीगे पोस्टरों में कोई चिंगारी लगी। जनता छाते लेकर भीगती रही, नेता पंडालों में माइक थामकर भाषणों का आतिशबाज़ी करते रहे।
एक दर्शक ने तंज कसते हुए कहा – “रावण का जलना जरूरी नहीं है, उसका जीवित रहना नेताओं के लिए ज्यादा सुविधाजनक है। कम से कम चुनाव तक जनता को हर साल यही दिखाकर मूड बनाया जा सकता है।”
आज की राजनीति में अच्छाई और बुराई की परिभाषा ही गड्डमड्ड हो गई है। विपक्ष सत्ता पक्ष को रावण कहता है, सत्ता पक्ष विपक्ष को। जनता सोचती है कि “असल में दोनों ही हमारे करों से बनी रावण सेना हैं, फर्क सिर्फ इतना है कि एक का पुतला मंच पर जलता है, दूसरे का ट्विटर पर।”
इस साल की विजयादशमी ने यही सबक दिया कि चाहे मैदान में रावण आधा जले या पूरा, असली बुराई को जलाने की किसी के पास न फुर्सत है, न हिम्मत। बारिश ने रंग में भंग डाला जरूर, लेकिन समाज ने अपने-अपने मोबाइल में त्योहार का नया ‘एंगल’ ढूंढ ही लिया। आखिरकार, परंपरा चाहे अधूरी रह जाए, पर सेल्फी और स्टेटस पूरे होने चाहिए।


