Thursday, 28 May 2026

एक तरफ ‘शिक्षा विकास का मूल मंत्र’, दूसरी तरफ पोटापारा में बच्चों को नहीं मिला स्कूल भवन — ग्रामीणों ने पूछा, कथनी और करनी में इतना फर्क क्यों?

महासमुंद। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ सरकार ने सुशासन और विकास का संकल्प लेकर कार्य प्रारंभ किया है। मुख्यमंत्री लगातार यह कहते रहे हैं कि “शिक्षा विकास का मूलमंत्र है, नई शिक्षा नीति के अनुरूप छत्तीसगढ़ में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारकर बच्चों को भविष्य के लिए तैयार किया जाएगा।”

वहीं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की गारंटियों को पूरा करते हुए राज्य सरकार ने ‘प्रधानमंत्री स्कूल फॉर राइजिंग इंडिया (PM SHRI)’ योजना के तहत 211 स्कूलों को चयनित किया है, जिन पर प्रति विद्यालय 2-2 करोड़ रुपये की राशि खर्च कर उन्हें विश्वस्तरीय शिक्षा संस्थान के रूप में विकसित किया जाना है।

सरकार के इन दावों के बीच महासमुंद जिले के ग्राम पोटापारा (ग्राम पंचायत बिछिया) की हकीकत इन वादों से बिल्कुल विपरीत तस्वीर दिखा रही है। गांव का प्राथमिक शाला भवन जर्जर होकर पूरी तरह टूट चुका है, और 45 से अधिक बच्चे मजबूरी में आंगनबाड़ी भवन में पढ़ाई कर रहे हैं।

ग्रामीणों ने बताया कि इस विषय पर वे तीन बार जनदर्शन पोर्टल पर आवेदन दे चुके हैं, साथ ही मुख्यमंत्री सुशासन महोत्सव में भी शिकायत दर्ज कराई थी, लेकिन आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।ग्रामवासियों का कहना है कि सरकार जहाँ एक ओर करोड़ों रुपये खर्च कर “विश्वस्तरीय शिक्षा” की बात करती है, वहीं दूसरी ओर एक छोटे से गांव के बच्चों को ढंग का भवन तक नसीब नहीं हो पा रहा।

ग्रामीणों ने प्रशासन को चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही प्राथमिक शाला भवन स्वीकृत नहीं किया गया, तो वे विद्यालय की तालाबंदी करने को मजबूर होंगे। “जब बड़े शहरों में स्कूलों को करोड़ों का बजट दिया जा सकता है, तो हमारे बच्चों को पढ़ने के लिए एक सुरक्षित भवन क्यों नहीं मिल सकता?”

यह मामला सरकार की नीतियों और जमीनी हकीकत के बीच गहरी खाई को उजागर करता है। जहाँ घोषणाएँ ‘विकसित भारत’ और ‘गुणवत्तापूर्ण शिक्षा’ की बात करती हैं, वहीं पोटापारा जैसे ग्रामीण इलाकों में बच्चे अब भी जर्जर भवनों में शिक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

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