Thursday, 9 Jul 2026

परीक्षा दिलाई, पास भी किया, लेकिन बिना हस्ताक्षर और सील की अंकसूची थमा दी, बच्चों का भविष्य अधर में

महासमुंद। जिले के शिक्षा विभाग का एक गंभीर और चिंताजनक मामला सामने आया है, जिसने विभागीय कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला दो ऐसे विद्यार्थियों का है, जिन्हें आठवीं बोर्ड परीक्षा में बैठने की अनुमति स्वयं शिक्षा विभाग ने दी। परीक्षा संपन्न हुई, परिणाम घोषित हुआ और दोनों विद्यार्थी अच्छे अंकों से उत्तीर्ण भी हो गए। लेकिन अब उन्हीं विद्यार्थियों को जो अंकसूची (मार्कशीट) दी गई है, उस पर न तो सक्षम अधिकारी के हस्ताक्षर हैं और न ही विभाग की आधिकारिक सील।

जानकारी के अनुसार पिथौरा विकासखंड के ग्राम बिजेमाल स्थित A.K. Smart English Medium School के छात्र तुषार साहू एवं कबीर पटेल को आठवीं बोर्ड परीक्षा में शामिल किया गया था। विभागीय दस्तावेजों में दोनों विद्यार्थियों के परीक्षा प्रवेश क्रमांक क्रमशः 833836 और 833837 दर्ज हैं। अंकसूची में विषयवार अंक भी दर्ज किए गए हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि परीक्षा प्रक्रिया विभाग की अनुमति और नियंत्रण में पूरी की गई।

यहीं से पूरा मामला विवादों में आ गया है। बिना हस्ताक्षर और सील वाली अंकसूची किसी भी शैक्षणिक या प्रशासनिक प्रक्रिया में वैध दस्तावेज नहीं मानी जाती। ऐसे में विद्यार्थियों का अगली कक्षा में प्रवेश, छात्रवृत्ति, दस्तावेज सत्यापन सहित कई महत्वपूर्ण प्रक्रियाएं प्रभावित हो सकती हैं।

जब अभिभावक इस संबंध में शिक्षा विभाग पहुंचे तो अधिकारियों ने संबंधित स्कूल की मान्यता नहीं होने तथा मामला उच्च न्यायालय में लंबित होने का हवाला दिया। लेकिन विभाग का यही तर्क अब उसके लिए सबसे बड़ा प्रश्न भी बन गया है।

यदि वास्तव में स्कूल की मान्यता नहीं थी और मामला न्यायालय में विचाराधीन था, तो फिर शिक्षा विभाग ने विद्यार्थियों को परीक्षा में शामिल होने की अनुमति किस आधार पर दी? परीक्षा फॉर्म किसने स्वीकार किए? प्रवेश पत्र कैसे जारी हुए? परीक्षा परिणाम क्यों घोषित किया गया? और जब पूरी प्रक्रिया विभाग की अनुमति से पूरी हुई, तो अब वैध अंकसूची जारी करने से परहेज क्यों किया जा रहा है?

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी प्रशासनिक या कानूनी विवाद का खामियाजा विद्यार्थियों को नहीं भुगतना चाहिए। यदि विद्यार्थियों ने विभाग की अनुमति से परीक्षा दी और सफलता प्राप्त की है, तो उन्हें वैध एवं विधिवत प्रमाणित अंकसूची उपलब्ध कराना विभाग की जिम्मेदारी है। भारत का संविधान शिक्षा के अधिकार और बच्चों के हितों की रक्षा की भावना को सर्वोच्च महत्व देता है। साथ ही न्यायालयों ने भी अनेक मामलों में यह सिद्धांत स्थापित किया है कि संस्थागत या प्रशासनिक त्रुटियों का दुष्प्रभाव निर्दोष विद्यार्थियों पर नहीं डाला जा सकता।

अहम सवाल

यदि स्कूल की मान्यता नहीं थी, तो परीक्षा में शामिल होने की अनुमति किसने और किस आदेश के आधार पर दी? क्या विभाग ने न्यायालय की स्थिति को जानते हुए भी विद्यार्थियों को परीक्षा दिलाई? परीक्षा परिणाम जारी करने के बाद अब अंकसूची पर हस्ताक्षर और सील क्यों नहीं लगाए जा रहे हैं? क्या विभाग अपनी ही प्रक्रिया पर सवाल खड़ा कर रहा है? क्या इस पूरे मामले में प्रशासनिक लापरवाही हुई है? क्या दो मासूम विद्यार्थियों का भविष्य विभागीय निर्णयों की भेंट चढ़ रहा है?

यह मामला केवल दो विद्यार्थियों की अंकसूची का नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की जवाबदेही और प्रशासनिक पारदर्शिता का भी है। यदि विभाग ने नियमों के तहत अनुमति दी थी, तो विद्यार्थियों को पूर्ण रूप से वैध दस्तावेज उपलब्ध कराए जाने चाहिए। और यदि अनुमति नियमों के विपरीत दी गई थी, तो इसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी स्थिति में विद्यार्थियों का भविष्य दांव पर नहीं लगना चाहिए। प्रशासनिक विवादों और न्यायालयीन प्रक्रियाओं का भार बच्चों पर डालना न तो न्यायसंगत है और न ही शिक्षा व्यवस्था की मूल भावना के अनुरूप।

Share This Article

- Advertisement -

error: Content is protected !!