महासमुंद | जिले में इन दिनों शराब दुकानों के बाहर “अवैध चखना सेंटर” न सिर्फ़ गिलास भर रहे हैं, बल्कि व्यवस्था की हकीकत भी छलका रहे हैं। हालात ऐसे हैं मानो दुकानों के बाहर “पहले चखो, फिर सोचो” योजना सरकारी संरक्षण में चल रही हो।
सूत्र बताते हैं कि जहां आबकारी अधिनियम की धारा 34(2) सीधे-सीधे दस्तक देनी चाहिए, वहां कार्रवाई का रास्ता घूमकर धारा 36(ए) तक ही सीमित रह जाता है। मतलब अपराध फुल, लेकिन कार्रवाई हाफ! जिले में पीने-पिलाने का खेल जितना जोरदार है, उतना ही जोरदार खेल कार्रवाई के नाम पर लेन-देन का भी बताया जा रहा है। कुछ स्थानों पर तो ऐसा दृश्य बन रहा है मानो अवैध चखना सेंटर नहीं, बल्कि “अनौपचारिक बार लाइसेंस” जारी कर दिया गया हो।
स्थानीय लोगों का कहना है कि कार्रवाई का डर अब चखने वालों को नहीं, बल्कि केवल कागज़ों को होता है। धरपकड़ होती है, पर इतनी हल्की कि अपराधी भी राहत की सांस लेकर अगली शाम फिर से चखना मेनू सजा लेते हैं। अब सवाल यह है कि क्या कानून सिर्फ़ बोतल पर लिखा रहता है? या फिर धाराएं भी स्वाद देखकर बदली जाती हैं? फिलहाल महासमुंद में कानून का पैमाना कुछ यूं नजर आ रहा है—“जितनी बड़ी बोतल, उतनी छोटी कार्रवाई।”
जिले में ऐसे मामलों की संख्या बढ़ती जा रही है, और अगर यही हाल रहा, तो आने वाले दिनों में चखना सेंटरों को पर्यटन स्थल घोषित करने की मांग भी उठ जाए, इसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा।


