महासमुंद। दो कमरों के मिट्टी के घर से शुरू हुआ सफर, और मंज़िल बनी न्यूयॉर्क की सड़कों तक। यह कहानी नहीं, बल्कि हकीकत है—छत्तीसगढ़ के छोटे कस्बे महासमुंद की बेटी प्रेमशीला बघेल की।
महासमुंद में जन्मी प्रेमशीला का बचपन अभाव और संघर्षों में बीता। माता-पिता दिहाड़ी मजदूर थे, और दो बहनों में छोटी बेटी के रूप में घर में उन्हें पहचान मिली। घर में दो वक्त की रोटी भी हमेशा सुनिश्चित नहीं थी। शिक्षा, स्वास्थ्य और आत्मविश्वास—तीनों ही उनके लिए एक सपना भर थे। 19 वर्ष की उम्र में उन्हें सामाजिक संस्था से जोड़ा गया, और उन्होंने इसे अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। यहीं से महिलाओं के सामाजिक जागरूकता का सिलसिला शुरू हुआ, जो आज तक जारी है।
वर्ष 1996 से प्रेमशीला महिलाओं और वंचित समुदायों के अधिकारों की लड़ाई में सक्रिय रही। छत्तीसगढ़ महिला जागृति संगठन में 11 वर्षों तक कार्य करते हुए उन्होंने हजारों महिलाओं को उनके अधिकार, स्वर और आत्मसम्मान से जोड़ा। वर्ष 2000 में न्यूयॉर्क में आयोजित वर्ल्ड मार्च ऑफ वुमन में उन्होंने भारत की प्रतिनिधि महिला दल के साथ भाग लिया और महिलाओं पर बढ़ती हिंसा और गरीबी जैसे ज्वलंत मुद्दों को संयुक्त राष्ट्र संघ के कार्यालय में दुनिया के सामने रखा।
बीच में पढ़ाई छूट गई थी, लेकिन रुकना प्रेमशीला के लिए कोई विकल्प नहीं था। काम करते हुए उन्होंने एम.ए. समाजशास्त्र, मास्टर ऑफ सोशल वर्क, और छत्तीसगढ़ी भाषा में स्नातक डिप्लोमा किया। विभिन्न स्वयंसेवी संस्थाओं में काम करने के बाद उन्होंने 2005 में उन्नयन जन विकास समिति की स्थापना की और उसका नेतृत्व संभाला।
प्रेमशीला का सामाजिक कार्य केवल भाषणों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने छोटे-छोटे फंड के माध्यम से जमीनी स्तर पर कार्य किया।महासमुंद जिले में लगभग 1,500 महिला समूहों के बैंक खातों का डिजिटलीकरण करवाया। नाबार्ड और एनयूएलएम जैसी योजनाओं से 15,000 महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया।
उन्होंने महिला हिंसा, शिक्षा, स्वास्थ्य, बाल श्रम और लैंगिक भेदभाव जैसे मुद्दों पर सम्मेलन, प्रशिक्षण, नुक्कड़ नाटक और कानूनी जागरूकता अभियान चलाए। किशोरियों के स्वास्थ्य और शिक्षा के लिए नवा अंजोर जैसे कार्यक्रमों में सक्रिय रहीं। बाल विवाह के खिलाफ अभियान में महिलाओं और पुरुषों दोनों को जागरूक किया। पर्यावरण संरक्षण के लिए गांव-गांव जाकर पर्यावरण मित्रों का नेटवर्क तैयार किया।
2005 से 2008 तक राजनांदगांव जिले में कुष्ठ पीड़ित और दिव्यांगों के समूह बनाए और उन्हें आजीविका के अवसर प्रदान किए। बुनकर महिलाओं, मिट्टी कला, बांस शिल्प और महिला कैंटीन के माध्यम से उन्होंने आजीविका की नई परिभाषा गढ़ी। उनका नेतृत्व पद या पुरस्कारों से नहीं, बल्कि सामुदायिक विश्वास और बदलाव के जज़्बे से उपजा। हर सफलता को उन्होंने ‘समूह की जीत’ कहा। उनके योगदान को कई संगठनों ने सराहा और उन्हें कई पुरस्कारों से सम्मानित किया।
आज भी प्रेमशीला महासमुंद के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में सोशल चेंज एजेंट के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने महिलाओं को आत्मनिर्भरता, आत्मसम्मान और आत्मबल से जोड़कर समाज में बदलाव की मिसाल कायम की। महासमुंद की पहली महिला के रूप में उन्हें रानी वीरांगना अवंती बाई लोधी सम्मान से नवाजा गया। राज्य अलंकरण समारोह में उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन द्वारा उन्हें सम्मानित किया गया।


