Saturday, 7 Mar 2026

तुमगांव उपतहसील में राजस्व भ्रष्टाचार की गूंज

महासमुंद। तुमगांव उपतहसील इन दिनों राजस्व विभाग में फैले भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही को लेकर विवादों के घेरे में है। ग्रामीणों द्वारा लगातार लगाए जा रहे गंभीर आरोप अब इस ओर इशारा कर रहे हैं कि पूरे सिस्टम में कहीं न कहीं मिलीभगत, मनमानी और निष्क्रियता की चुप सहमति बनी हुई है।

अधिकारियों  के खिलाफ रिश्वतखोरी, देरी और अवैध वसूली के आरोप

तुमगांव और आसपास के ग्राम पंचायतों के कई ग्रामीणों ने बताया कि राजस्व विभाग के काम बिना “दक्षिणा” के पूरे नहीं होते। नक्शा, बी-1, खसरा की नकल, सीमांकन, खाता विभाजन जैसे कार्यों को महीनों तक लंबित रखा जाता है। नामांतरण जैसे मामलों में तो जानबूझकर आपत्ति लगाकर ग्रामीणों को तहसील कार्यालय के चक्कर कटवाए जाते हैं।

ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया है कि कुछ अधिकारियों के नजदीकी रिश्तेदार क्षेत्र में फर्शी पत्थर, रेत व ज़मीन की खरीद-फरोख्त और अवैध वसूली में संलिप्त हैं। इससे स्पष्ट है कि राजस्व विभाग अब सेवा का नहीं, कमाई का माध्यम बन गया है।

नायब तहसीलदार की पोस्टिंग पर गंभीर सवाल

स्थानीय सूत्रों के अनुसार, तुमगांव में पदस्थ नायब तहसीलदार स्वयं इसी क्षेत्र के मूल निवासी हैं। यह प्रशासनिक नियमों का खुला उल्लंघन है।

 क्या कहता है नियम?
सरकारी सेवा नियमावली के अनुसार, किसी भी अधिकारी की नियुक्ति उसके गृह ग्राम या कार्यक्षेत्र में नहीं की जानी चाहिए ताकि वह निष्पक्ष प्रशासन कर सके और किसी भी प्रकार के प्रभाव से मुक्त रहे।

परंतु यहाँ तो “घर का मामला, घर में ही निपट रहा है।” — ऐसे आरोप लग रहे हैं कि परिचितों को लाभ पहुँचाया जा रहा है और शिकायतों को दबाया जा रहा है।

जनता की मांगें – अब बर्दाश्त नहीं!

ग्रामीणों ने प्रशासन और शासन के समक्ष कुछ स्पष्ट और जनहितकारी मांगें रखी हैं:

नायब तहसीलदार का तत्काल स्थानांतरण — गृह ग्राम से बाहर पदस्थ किया जाए।
 पटवारियों की स्वतंत्र जांच — विगत 3 वर्षों के दस्तावेज़ी कार्यों की निष्पक्ष जांच हो।
 CG Bhuiyan पोर्टल का अनिवार्य उपयोग — राजस्व कार्यों को ऑनलाइन और पारदर्शी बनाया जाए।

प्रशासन की ज़िम्मेदारी बनती है!

यदि शासन और जिला प्रशासन इस मामले में जल्द कदम नहीं उठाता, तो आम जनता में न्याय व्यवस्था के प्रति विश्वास टूटने लगेगा। जहाँ शासन खुद ग्रामीणों को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाने की बात करता है, वहाँ उन्हीं की ज़मीन, हक और अधिकार पर प्रशासनिक तंत्र का पहरा लगा हुआ है।

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