Saturday, 7 Mar 2026

महिला आरक्षक की वर्दी फाड़ी, रोती-बिलखती रही ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी

रायगढ़। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के तमनार में जिंदल पावर लिमिटेड को आवंटित गारे पेलमा सेक्टर-1 कोयला खदान के विरोध में चल रहा जनआंदोलन 27 दिसंबर को हिंसक हो गया। इस दौरान मानवता को कलंकित करने वाली एक घिनौनी घटना सामने आई, जहां उग्र भीड़ ने एक महिला आरक्षक को घेरकर उसकी वर्दी फाड़ दी और अभद्रता की हद पार कर दी। पीड़ित महिला आरक्षक बार-बार हाथ जोड़कर रहम की भीख मांगती रही, “भाई छोड़ दो, माफ कर दो, आगे से नहीं आऊंगी” कहती सुनाई दे रही है, लेकिन दरिंदगी पर उतरी भीड़ ने उसकी एक न सुनी और अपनी करतूत का मोबाइल से वीडियो बनाता रहा।

यह शर्मनाक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद मामला उजागर हुआ। पुलिस ने तत्काल संज्ञान लेते हुए सायबर सेल की मदद से वीडियो हटवाया और बीएनएस की गंभीर धाराओं के तहत केस दर्ज किया। अब तक दो आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, जबकि अन्य की तलाश जारी है।

हिंसक प्रदर्शन की आड़ में दरिंदगी

घटना 27 दिसंबर की है, जब 14 प्रभावित गांवों के ग्रामीण लिबरा गांव के सीएचपी चौक पर धरना दे रहे थे। धरना हटाने पहुंची पुलिस टीम पर भीड़ ने पथराव शुरू कर दिया। इस झड़प में तमनार थाना प्रभारी कमला पुसाम सहित कई पुलिसकर्मी घायल हुए। भीड़ ने पुलिस वाहनों में तोड़फोड़ की, आग लगाई और जिंदल के कोल हैंडलिंग प्लांट में घुसकर कन्वेयर बेल्ट व अन्य संपत्ति को नुकसान पहुंचाया।

लेकिन सबसे निंदनीय घटना एक महिला आरक्षक के साथ हुई। वायरल वीडियो में साफ दिख रहा है कि युवकों का एक समूह उसे घेरकर वर्दी नोच रहा है, उसे आधा किलोमीटर तक दौड़ाया और खेत में गिरने पर अर्धनग्न कर दिया। रोती-बिलखती महिला बार-बार गुहार लगा रही है, लेकिन उन्मादी भीड़ अपनी हरकतों की रिकॉर्डिंग करती रही।

पुलिस की कार्रवाई शुरू, लेकिन सवाल बरकरार

वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस हरकत में आई। दो युवकों को गिरफ्तार किया गया, जिन पर महिला थाना प्रभारी की वर्दी फाड़ने और मारपीट का आरोप है। अलग-अलग एफआईआर में 100 से अधिक प्रदर्शनकारियों पर गंभीर धाराएं लगाई गई हैं। जिंदल पावर ने भी हिंसा के बाद जनसुनवाई का आवेदन वापस ले लिया, और प्रशासन ने इसे निरस्त करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

सरकार और प्रशासन पर उठते सवाल

– कोयला खदान के लिए जनसुनवाई को ग्रामीण ‘फर्जी’ बता रहे हैं, तो इसे गुपचुप तरीके से क्यों कराया गया? ग्राम सभा की सहमति के बिना कैसे आगे बढ़ी प्रक्रिया?

– 12 दिसंबर से चल रहे शांतिपूर्ण धरने को 27 दिसंबर को हटाने की कोशिश क्यों की गई? क्या पुलिस बलप्रयोग की तैयारी के बिना गई, जिससे हालात बेकाबू हुए?

– महिला पुलिसकर्मी के साथ इतनी बर्बरता हुई, फिर भी पुलिस अधिकारी क्यों चुप हैं? क्या महिला सुरक्षा के दावे सिर्फ कागजों तक सीमित हैं?

– हिंसा में घायल पुलिसकर्मियों के लिए त्वरित कार्रवाई हुई, लेकिन क्या प्रदर्शनकारियों की genuine मांगों – जल, जंगल, जमीन की रक्षा – को अनदेखा कर विकास के नाम पर जबरन खदान थोपी जा रही है?

– राज्य सरकार आदिवासी हितैषी होने का दावा करती है, तो प्रभावित गांवों की सुनवाई क्यों नहीं हुई? क्या औद्योगिक घरानों के हित में ग्रामीणों की कुर्बानी दी जा रही है? यह घटना न केवल कानून-व्यवस्था की नाकामी उजागर करती है, बल्कि समाज में छिपी दरिंदगी को भी सामने लाती है। आंदोलनकारी अपनी जमीन बचाने के लिए सड़क पर हैं, लेकिन हिंसा और अभद्रता किसी समस्या का हल नहीं। सरकार जागे, नहीं तो ऐसे आंदोलन बड़ा जनाक्रोश बन सकते हैं। अन्नदाता और आदिवासी की पुकार अनसुनी न रहे!

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