महासमुंद। एक गरीब परिवार का सहारा जब दुनिया छोड़ जाता है, तो सिर्फ एक इंसान नहीं जाता… उसके साथ एक पूरे परिवार की उम्मीदें, बच्चों का भविष्य और घर का सहारा भी टूट जाता है। महासमुंद के शिवालिक इंजीनियरिंग इंडस्ट्रीज में काम करने वाले कर्मचारी रमेश जांगड़े की मौत के बाद सामने आया दर्दनाक मामला इसी सवाल को खड़ा करता है कि आखिर मजदूरों की जिंदगी की कीमत क्या है?
गौरतलब है कि 22 मार्च को प्लांट में काम करने के दौरान रमेश जांगड़े घायल हो गए थे। परिजनों का आरोप है कि काम के दौरान उनकी आंख में गंभीर चोट लगी, जिसके बाद उनकी आंखों की रोशनी चली गई। घटना के बाद उन्हें इलाज के लिए रायपुर के निजी अस्पताल भेजा गया, लेकिन इलाज के दौरान उनकी हालत लगातार बिगड़ती गई। परिजनों के मुताबिक, रमेश को पैरालिसिस अटैक भी आया और शरीर का एक हिस्सा काम करना बंद कर दिया। आंख में संक्रमण बढ़ने के बाद आखिरकार उन्होंने जिंदगी की जंग हार दी।
रमेश की मौत के बाद परिवार और ग्रामीणों का दर्द गुस्से में बदल गया। परिजन शव को लेकर शिवालिक प्लांट के सामने पहुंच गए और न्याय की मांग को लेकर प्रदर्शन शुरू कर दिया। परिवार का सवाल था कि अगर प्लांट में सुरक्षा के बेहतर इंतजाम होते, तो क्या आज रमेश अपने बच्चों और परिवार के बीच होते?
एक मजदूर अपने घर से रोजी-रोटी कमाने निकलता है, लेकिन उसके परिवार को यह भरोसा रहता है कि शाम को वह वापस लौटेगा। रमेश भी अपने परिवार के सपनों को पूरा करने निकले थे, लेकिन एक हादसे ने एक मां से उसका बेटा छीन लिया, एक बहन से उसका भाई छीन लिया गया। एक समाज से उसका युवा छीन लिया गया। एक पिता से उसके बुढ़ापे का सहारा छीन लिया गया और परिवार से उनका सहारा छीन लिया।
इस घटना ने औद्योगिक संस्थानों में मजदूरों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर काम करने वाले कर्मचारियों के लिए सुरक्षा उपकरण, निगरानी और सावधानी के क्या इंतजाम थे? क्या नियमों का पालन हो रहा था या फिर सिर्फ कागजों में ही सुरक्षा दिखाई जा रही है?
वहीं सरकारी व्यवस्था पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है। औद्योगिक क्षेत्रों में मजदूरों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी संबंधित विभागों की होती है। ऐसे हादसों के बाद जांच और कार्रवाई सिर्फ कागजी प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि यह तय होना चाहिए कि लापरवाही किस स्तर पर हुई और जिम्मेदार कौन है।
घंटों चले प्रदर्शन के बाद प्रशासन की मौजूदगी में प्लांट प्रबंधन और परिजनों के बीच बातचीत हुई। तहसीलदार महासमुंद ने बताया कि सहमति बनी है कि मृतक रमेश जांगड़े की सैलरी के बराबर राशि परिवार को आजीवन दी जाएगी। वहीं पत्नी की मृत्यु की स्थिति में बच्चों को 24 साल की उम्र तक सहायता राशि देने की बात कही गई है। हालांकि आर्थिक मदद किसी परिवार के दर्द को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकती। क्योंकि एक गरीब परिवार के लिए कमाने वाले सदस्य की मौत सिर्फ आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि जिंदगी भर का संघर्ष बन जाती है।
यह घटना सिर्फ रमेश जांगड़े के परिवार की कहानी नहीं है, बल्कि हर उस मजदूर की आवाज है जो अपने पसीने से उद्योगों को चलाता है। जरूरत है कि मजदूर अपने अधिकारों के लिए जागरूक हों और जिम्मेदार संस्थाएं मजदूरों की सुरक्षा को सबसे पहली प्राथमिकता दें। क्योंकि किसी भी उद्योग की तरक्की से पहले जरूरी है — उस उद्योग में काम करने वाले इंसान की जिंदगी की सुरक्षा।


