महासमुंद। जिले के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की लापरवाही और गैरजिम्मेदाराना रवैया थमने का नाम नहीं ले रहा है। इसका जीता-जागता उदाहरण शुक्रवार को प्राथमिक माध्यमिक शाला बरौंडा बाजार में देखने को मिला, जब जिला शिक्षा अधिकारी विजय कुमार लहरे ने आकस्मिक निरीक्षण किया।
निरीक्षण के दौरान प्रार्थना सभा कराई गई। हैरानी की बात यह रही कि विद्यालय में 7 शिक्षक पदस्थ हैं, लेकिन प्रार्थना में केवल एक शिक्षिका ही मौजूद थीं। शेष 4 शिक्षक देर से पहुंचे, जबकि निरीक्षण अवधि तक 2 शिक्षक अनुपस्थित ही रहे।
जिला शिक्षा अधिकारी ने मौके पर ही विलंब से आने वाले शिक्षकों को शो-कॉज नोटिस जारी किया और अनुपस्थित रहने वालों के वेतन काटने के निर्देश दिए। सवाल यह है कि जब जिला मुख्यालय से सटे स्कूलों की यह स्थिति है तो दूर-दराज के ग्रामीण अंचलों के स्कूलों में शिक्षा का स्तर किस कदर गिरा होगा, इसका सहज अंदाज़ा लगाया जा सकता है। अमूमन यही तस्वीर जिले के अधिकांश स्कूलों की है, जहां शिक्षकों की मनमानी के चलते बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है।
एक तरफ सरकार “पढ़ेगा इंडिया – तभी तो बढ़ेगा इंडिया” जैसे नारे देती है, लेकिन क्या केवल नारों से ही भारत बढ़ेगा? जब शिक्षक ही अपनी जिम्मेदारी निभाने में नाकाम रहेंगे तो बच्चों का भविष्य कैसे सुरक्षित होगा?
क्या केवल नोटिस जारी करने और वेतन काटने भर से ऐसे गैरजिम्मेदार शिक्षकों में सुधार लाया जा सकता है? क्या जिला शिक्षा अधिकारी के लगातार दौरे करने के बावजूद हालात में कोई ठोस सुधार दिखाई दे रहा है? क्या शिक्षा विभाग को अब और कड़े कदम उठाने की आवश्यकता नहीं है? यह मामला शिक्षा व्यवस्था की बिगड़ती सूरत और शिक्षकों की लापरवाह मानसिकता पर बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है। ग्रामीण अभिभावकों का कहना है कि ऐसे शिक्षकों पर सिर्फ नोटिस नहीं, बल्कि स्थानांतरण और सेवा से बर्खास्तगी जैसी कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए ताकि शिक्षा का स्तर सुधर सके।


