महासमुंद/पिथौरा। पिथौरा ब्लॉक में फर्जी जमीन खरीदी-बिक्री का एक और मामला सामने आया है। आरोप है कि 17 साल पहले गुजर चुकी महिला की जगह उसकी सौत को खड़ा कर रजिस्ट्री करा दी गई। ग्राम डोगांझर (थाना तेन्दूकोना) निवासी हीराधर साहू ने कलेक्टर महासमुंद को शिकायत सौंपकर पूरी रजिस्ट्री निरस्त करने और दोषियों पर कार्रवाई की मांग की है।
शिकायत के अनुसार हीराधर साहू पिता महेश साहू ने 15 जून 2007 को ग्राम डोगांझर की भू-स्वामी आसिनबाई पति बिसंभर पाड़े से खसरा नंबर 115, रकबा 0.04 की जमीन खरीदी थी। सौदा गांव के प्रमुख पंचों के सामने लिखापढ़ी कर हुआ। कुछ समय बाद आसिनबाई की मृत्यु हो गई, जिससे रजिस्ट्री नहीं हो सकी। फौती नहीं कटने से मामला अटका रहा, पर हीराधर का कब्जा खरीदी के दिन से आज तक बना हुआ है।
20 सितंबर 2026 को हीराधर को पता चला कि वही जमीन अब किसी भानसिंग पाड़े पिता शीतल पाड़े के नाम दिखाई दे रही है। रजिस्ट्रार कार्यालय जाकर पड़ताल की गई तो रजिस्ट्री हो चुकी थी। नकल निकलवाने पर आरोप सामने आया कि आसिनबाई की सौत मानोबाई पति बिसंभर पाड़े को ही आसिनबाई बताकर शपथ के लिए खड़ा किया गया था। यानी मृतका के नाम पर जीवित महिला को पेश कर रजिस्ट्री करा ली गई।
मामला खुलने पर गांव की बैठक में मानोबाई को बुलाकर पूछताछ की गई। शिकायत के मुताबिक उसने बताया कि भानसिंग पाड़े उसे अस्पताल में सुई लगवाने के बहाने ले गया था। वहां क्या कराया गया, यह उसे नहीं पता। इससे आशंका जताई गई है कि उसे अंधेरे में रखकर दस्तावेजों पर हस्ताक्षर या अंगूठा लगवाया गया।
शिकायत में शामिल लक्ष्मी चक्रधारी पिता बिसंभर ने कहा है कि उनकी बड़ी मां आसिनबाई की मृत्यु करीब 17 वर्ष पहले हो चुकी है। उनके मुताबिक मझली बड़ी मां मानोबाई मानसिक रूप से कमजोर हैं। आरोप है कि इसी का फायदा उठाकर घर पर कोई न होने के समय उन्हें ले जाकर रजिस्ट्री कराई गई। शिकायत हीराधर साहू, मानोबाई और लक्ष्मी तीनों की ओर से संयुक्त रूप से की गई है।
आवेदकों ने पूरी फर्जी रजिस्ट्री निरस्त करने के साथ भानसिंग पाड़े पिता शीतल पाड़े, शोभन पाड़े पिता तुलसीराम पाड़े और रेणु पाड़े पर उचित कार्रवाई की मांग की है। आवेदन के साथ रजिस्ट्री की नकल और आसिनबाई द्वारा पूर्व में किया गया बिक्री लेख लगाया गया है।
यह मामला अकेला नहीं है। पिथौरा क्षेत्र में एक के बाद एक फर्जी खरीदी-बिक्री और रजिस्ट्री के मामले उजागर हो रहे हैं। कहीं सरकारी जमीन बिक गई, कहीं निस्तारी तालाब को कृषि भूमि बताकर बेच दिया गया, तो कहीं जीवित व्यक्ति को कागजों में मृत दिखाकर सौदा कर दिया गया। हर बार शिकायत होती है, पर कार्रवाई कछुआ चाल से चलती है।
सवाल यह है कि मृतका के नाम पर रजिस्ट्री होते समय पहचान की जांच किसने की। क्या पटवारी, राजस्व निरीक्षक और तहसीलदार स्तर पर रिकॉर्ड का मिलान नहीं हुआ? रजिस्ट्रार कार्यालय में गवाहों और पहचानकर्ताओं की भूमिका क्या रही? क्या इतना बड़ा खेल बिना अंदरूनी मिलीभगत के संभव है? अब निगाहें कलेक्टर पर हैं कि वे इस शिकायत पर समयबद्ध जांच कराते हैं या यह आवेदन भी फाइलों में दब जाता है। जब रजिस्ट्री जैसे दस्तावेज में ही फर्जीवाड़ा हो सकता है, तो गांव का किसान अपनी जमीन को सुरक्षित कैसे माने?


