Saturday, 7 Mar 2026

फर्जी दस्तावेज़ से विधायक बनीं शकुंतला? FIR की मांग तेज

प्रतापपुर।प्रतापपुर विधानसभा की भाजपा विधायक शकुंतला सिंह पोर्ते एक बार फिर विवादों में घिर गई हैं। इस बार उन पर फर्जी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर चुनाव लड़ने का गंभीर आरोप लगा है, जिससे आदिवासी समाज में व्यापक रोष है। प्रदेश के वरिष्ठ आदिवासी नेता एवं पूर्व मंत्री डॉ. प्रेमसाय सिंह टेकाम ने एक सामाजिक सभा में कहा कि विधायक का जाति प्रमाण पत्र “प्रथम दृष्टया फर्जी” प्रतीत होता है। उन्होंने इसे आदिवासी समाज के सम्मान के साथ सीधा खिलवाड़ बताया।

डॉ. टेकाम ने दावा किया कि शकुंतला सिंह पोर्ते मूल रूप से उत्तर प्रदेश की निवासी हैं। ऐसे में छत्तीसगढ़ में उन्हें अनुसूचित जनजाति (ST) का लाभ मिलना संभव नहीं है। यह आरोप राजनीतिक हलकों में तेजी से चर्चा का विषय बन गया है। सभा में मौजूद सैकड़ों आदिवासी प्रतिनिधियों ने इस मुद्दे पर तत्काल जांच की मांग की। समाज ने कहा कि फर्जी दस्तावेज़ के आधार पर चुनाव लड़ना संविधान और समाज दोनों का अपमान है। आदिवासी समाज ने बैठक में एक “खोजबीन समिति” गठित करने का निर्णय लिया है। यह समिति विधायक के जाति प्रमाण पत्र, मूल निवास, जन्मस्थान और अन्य दस्तावेज़ों की विस्तृत जांच करेगी।

समाज के प्रमुख नेताओं ने स्पष्ट कहा कि यदि प्रमाण पत्र फर्जी पाया गया, तो समाज स्वयं FIR दर्ज कराएगा और विधायक पद निरस्तीकरण की कानूनी लड़ाई लड़ेगा। अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष भानू प्रताप सिंह ने भी इस प्रकरण को “बेहद गंभीर” बताया। उन्होंने कहा कि फर्जी दस्तावेज़ों के आधार पर चुनाव जीतना समाज और संविधान दोनों का अपमान है। आयोग की सक्रियता के बाद मामला और भी हाई-प्रोफाइल हो गया है। आयोग ने प्रशासन को इस मामले को प्राथमिकता से लेने की सलाह दी है।

इधर विपक्षी दलों ने भी भाजपा पर सीधा हमला बोलना शुरू कर दिया है। विपक्ष का कहना है कि यदि दस्तावेज़ फर्जी थे, तो पार्टी ने ऐसे उम्मीदवार को टिकट कैसे दिया। विपक्ष ने यह भी आरोप लगाया कि भाजपा ने राजनीतिक लाभ के लिए मामले को दबाने की कोशिश की, लेकिन अब समाज के विरोध के कारण यह विवाद सतह पर आ गया है। यह विवाद धीरे-धीरे प्रतापपुर से बलरामपुर, राजपुर और रायपुर तक फैल चुका है। आदिवासी समाज इसे सम्मान और अस्तित्व से जुड़े मुद्दे के रूप में देख रहा है।

कई आदिवासी संगठन इस मामले में व्यापक आंदोलन की तैयारी में जुट गए हैं। समाज का कहना है कि यह मामला केवल एक विधायक का नहीं, बल्कि पूरी आदिवासी पहचान से जुड़ा मुद्दा है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रशासन इस मामले की निष्पक्ष जांच करेगा या राजनीतिक दबाव के चलते इसे फिर ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा।

कानूनी तौर पर फर्जी जाति प्रमाण पत्र का उपयोग गैर-जमानती और दंडनीय अपराध है। दोषी पाए जाने पर जेल, जुर्माना और जनप्रतिनिधित्व से अयोग्यता—तीनों संभव हैं। प्रशासनिक जांच, FIR और दस्तावेज़ सत्यापन की मांग लगातार तेज हो रही है। समाज चाहता है कि निष्पक्ष जांच के बाद सच्चाई सामने आए और दोषियों पर कार्रवाई हो। छत्तीसगढ़ की राजनीति में यह मुद्दा आने वाले दिनों में बड़ा मोड़ साबित हो सकता है, क्योंकि यह मामला अब सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक सम्मान से जुड़ा हुआ है।

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