बिलासपुर। रतनपुर थाना से सामने आया मारपीट का मामला अब गंभीर जनचर्चा का विषय बन चुका है। फरियादी के साथ कथित मारपीट का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसने पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली पर कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। थाना परिसर के भीतर हुई इस घटना ने वर्दी की गरिमा को ठेस पहुंचाई है और आम लोगों का भरोसा डगमगाया है।
आरोप है कि फरियादी अपने परिवाद की जांच रिपोर्ट के लिए कई दिनों से थाना के चक्कर काट रहा था। इसी दौरान रिपोर्ट तैयार करने के नाम पर पैसे लेने की बात भी सामने आई है। जब फरियादी ने काम में देरी और पैसे लेने के बावजूद कार्रवाई नहीं होने पर सवाल उठाया, तब कथित रूप से उसे थप्पड़ मारकर अपमानित किया गया। यदि यह आरोप सही हैं, तो मामला केवल मारपीट तक सीमित नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार और अधिकारों के दुरुपयोग से भी जुड़ा है।
वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस विभाग हरकत में आया और आरोपी कर्मचारी पर निलंबन व एफआईआर जैसी कार्रवाई की गई। यह प्रारंभिक कदम आवश्यक जरूर है, लेकिन पर्याप्त नहीं कहा जा सकता। जनता जानना चाहती है कि क्या यह कार्रवाई केवल बढ़ते दबाव को शांत करने के लिए है या दोषियों को वास्तव में दंडित करने के लिए।
पुलिस थाना आम नागरिक के लिए न्याय की पहली चौखट होता है। यदि वहीं फरियादी को अपमान, डर और हिंसा का सामना करना पड़े, तो व्यवस्था पर विश्वास कैसे कायम रहेगा? ऐसे मामलों में समयबद्ध विभागीय जांच, पारदर्शी कार्रवाई और दोष सिद्ध होने पर कठोर दंड अनिवार्य होना चाहिए।
यह भी समझना होगा कि कुछ लोगों की मनमानी पूरी पुलिस व्यवस्था की छवि खराब कर देती है। ईमानदारी से काम करने वाले पुलिसकर्मियों की प्रतिष्ठा भी ऐसे मामलों से प्रभावित होती है। इसलिए विभाग को अनुशासन और जवाबदेही दोनों पर समान रूप से ध्यान देना होगा। रतनपुर का यह वायरल वीडियो चेतावनी है कि वर्दी अधिकार देती है, अत्याचार का लाइसेंस नहीं। यदि दोषियों पर उदाहरणीय कार्रवाई नहीं हुई, तो जनता का भरोसा लगातार कमजोर होता जाएगा।


