संचालनालय के निर्देश पर पिथौरा लौटे, फिर बरतुंगा में संलग्न, आरोप है उपस्थिति कहीं और, काम महासमुंद में!
महासमुंद। जिले के कृषि विभाग में ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी जितेन्द्र पटेल के संलग्नीकरण का मामला अब विभागीय व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। कृषि स्नातक शासकीय कृषि अधिकारी संघ के विरोध और संचालनालय के निर्देश के बाद जितेन्द्र पटेल को कृषि विकास अधिकारी कार्यालय पिथौरा में पदस्थ किया गया। लेकिन इसके बाद उन्हें शासकीय प्रक्षेत्र बरतुंगा में संलग्न कर दिया गया। आरोप है कि कागजों में उनकी उपस्थिति बरतुंगा में दर्ज होती है, जबकि वे लगातार उप संचालक कृषि कार्यालय महासमुंद में आकर काम कर रहे हैं। यदि यह स्थिति सही है, तो सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर संलग्नीकरण और कार्यस्थल की व्यवस्था किसके निर्देश पर चल रही है? क्या संचालनालय के आदेशों का पालन केवल कागजों तक सीमित है? और यदि जितेन्द्र पटेल का वास्तविक कार्यस्थल महासमुंद ही है, तो उनकी पदस्थापना और उपस्थिति की व्यवस्था स्पष्ट क्यों नहीं की जा रही?
संघ का विरोध, संचालनालय का निर्देश, फिर भी विवाद बरकरार
जितेन्द्र पटेल के संलग्नीकरण का मामला पहले भी विवादों में रहा है। कृषि स्नातक शासकीय कृषि अधिकारी संघ ने उनके संलग्नीकरण का विरोध करते हुए सामूहिक हस्ताक्षरयुक्त ज्ञापन दिया था। मामले में संचालनालय कृषि, छत्तीसगढ़ ने 30 मार्च 2026 को पत्र जारी कर उप संचालक कृषि कार्यालय महासमुंद में उनका संलग्नीकरण उचित नहीं माना था। इसके बाद उन्हें मूल पदस्थापना स्थल के लिए भारमुक्त करने के निर्देश भी दिए गए थे।लेकिन अब पिथौरा में पदस्थापना के बाद बरतुंगा में संलग्न किए जाने और महासमुंद कार्यालय में लगातार काम करने के आरोपों ने पूरे मामले को फिर चर्चा में ला दिया है। सवाल यह है कि जब विभागीय स्तर पर आपत्ति दर्ज हो चुकी है और संचालनालय के निर्देश भी जारी हो चुके हैं, तो फिर ऐसी व्यवस्था आखिर क्यों बनी हुई है?
उप संचालक कृषि की भूमिका पर सवाल। इस पूरे मामले में उप संचालक कृषि की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। यदि जितेन्द्र पटेल की पदस्थापना और संलग्नीकरण किसी अन्य स्थान पर है, तो वे महासमुंद कार्यालय में किस आदेश के तहत नियमित रूप से काम कर रहे हैं? क्या इसके लिए सक्षम अधिकारी की लिखित अनुमति है? उनकी वास्तविक उपस्थिति, कार्य आवंटन और संलग्नीकरण से संबंधित आदेशों की जांच हुई है या नहीं?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या विभागीय आदेशों से अलग कोई समानांतर व्यवस्था चल रही है? यदि ऐसा नहीं है, तो विभाग को दस्तावेजों के साथ स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। वहीं, यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो जिम्मेदारी तय कर नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। कृषि विभाग किसानों से जुड़ी योजनाओं और मैदानी कार्यों के लिए महत्वपूर्ण है। ऐसे में अधिकारियों की पदस्थापना, उपस्थिति और कार्यस्थल को लेकर उठ रहे सवालों की अनदेखी नहीं की जा सकती। अब देखना होगा कि जिला प्रशासन और कृषि विभाग के वरिष्ठ अधिकारी इस मामले में क्या रुख अपनाते हैं और उप संचालक कृषि इस पूरे प्रकरण पर क्या जवाब देते हैं।


