महासमुंद। सरकार गरीब और जरूरतमंद परिवारों को पक्का मकान उपलब्ध कराने के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना चला रही है, लेकिन महासमुंद जिले के ग्राम कोसरंगी निवासी एक गरीब परिवार की कहानी सरकारी योजनाओं और प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। महासमुंद शहर से करीब 7 किलोमीटर दूर ग्राम कोसरंगी में रहने वाले मनोज साहू का मिट्टी का कच्चा मकान आखिरकार बीती रात हुई बारिश के कारण पूरी तरह ढह गया। बताया जा रहा है कि मनोज साहू पिछले करीब 14 वर्षों से प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ पाने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन आज तक उन्हें पक्का मकान नहीं मिल पाया।
मनोज साहू का कहना है कि वह प्रधानमंत्री आवास योजना के लिए पात्र हैं और पिछले कई वर्षों से ग्राम पंचायत से लेकर जनपद पंचायत और जिला पंचायत तक अधिकारियों के समक्ष अपनी समस्या रख चुके हैं। उनका आरोप है कि उन्होंने जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जनपद पंचायत के सीईओ और कलेक्टर कार्यालय तक पहुंचकर प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ दिलाने की गुहार लगाई, लेकिन इसके बावजूद उनकी समस्या का समाधान नहीं हुआ।
मनोज साहू के अनुसार, लंबे समय से वह इस उम्मीद में थे कि कभी न कभी सरकार की आवास योजना के तहत उन्हें पक्का मकान मिलेगा और उनका परिवार सुरक्षित छत के नीचे रह सकेगा। लेकिन प्रशासनिक प्रक्रिया और जिम्मेदार अधिकारियों की कथित लापरवाही के बीच उनकी यह उम्मीद अब तक पूरी नहीं हो सकी। वहीं, लगातार बारिश के बीच उनका मिट्टी का कच्चा मकान भी आखिरकार जवाब दे गया और बीती रात भरभराकर पूरी तरह ढह गया।
मनोज साहू की आर्थिक स्थिति भी बेहद कमजोर बताई जा रही है। वह मिस्त्री का काम और दिहाड़ी मजदूरी करके अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं। उनके परिवार में करीब 13-14 वर्ष की एक बेटी और 10 वर्ष का एक बेटा है। बताया जा रहा है कि उनकी पत्नी मानसिक रूप से बीमार हैं और वर्तमान में अपने मायके में रह रही हैं। ऐसे में मनोज साहू अकेले ही मेहनत-मजदूरी कर अपने दोनों बच्चों की जिम्मेदारी उठा रहे हैं।
कच्चा मकान ढहने के बाद अब मनोज साहू और उनके बच्चों के सामने सबसे बड़ी समस्या सिर छिपाने की है। बारिश के मौसम में घर का आशियाना छिन जाने से परिवार की मुश्किलें और बढ़ गई हैं। जिस परिवार को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत वर्षों पहले पक्का मकान मिल जाना चाहिए था, वह आज भी सरकारी मदद की आस लगाए बैठा है।

यह मामला केवल एक गरीब परिवार के मकान ढहने का नहीं, बल्कि सरकारी योजनाओं के जमीनी क्रियान्वयन पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। यदि मनोज साहू वास्तव में प्रधानमंत्री आवास योजना के पात्र हितग्राही हैं और उन्होंने वर्षों से आवेदन एवं अधिकारियों के समक्ष अपनी समस्या रखी है, तो आखिर इतने लंबे समय तक उन्हें योजना का लाभ क्यों नहीं मिला? क्या पात्र हितग्राहियों की सूची और आवास स्वीकृति प्रक्रिया में कहीं लापरवाही हुई? क्या ग्राम पंचायत, जनपद पंचायत या जिला पंचायत स्तर पर उनकी शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया गया?

अब देखना यह होगा कि मनोज साहू का मिट्टी का मकान ढहने के बाद प्रशासन इस मामले को कितनी गंभीरता से लेता है। जरूरत है कि जिला प्रशासन तत्काल मौके का निरीक्षण कर पीड़ित परिवार को राहत और सुरक्षित आश्रय उपलब्ध कराए तथा प्रधानमंत्री आवास योजना के लिए उनकी पात्रता की निष्पक्ष जांच कर उन्हें जल्द से जल्द योजना का लाभ दिलाए। ताकि वर्षों से पक्के मकान की आस लगाए बैठे मनोज साहू और उनके बच्चों को आखिरकार एक सुरक्षित छत मिल सके।


