रायपुर/बीजापुर। छत्तीसगढ़ में नक्सल विरोधी अभियान को एक बड़ी सफलता मिली है। गांधी जयंती के अवसर पर बीजापुर जिले में कुल 103 नक्सलियों ने हथियार डाल दिए और हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में शामिल होने का ऐलान किया। आत्मसमर्पण करने वालों में 49 इनामी नक्सली भी शामिल हैं, जिन पर कुल 1.06 करोड़ रुपये का इनाम घोषित था। इनमें 22 महिलाएँ भी शामिल हैं। आत्मसमर्पण कार्यक्रम पुलिस और अर्धसैनिक बलों की मौजूदगी में हुआ। राज्य सरकार की पुनर्वास नीति के तहत आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को 50 हजार रुपये की तात्कालिक सहायता राशि भी दी गई।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने सुरक्षाबलों को बधाई देते हुए कहा कि यह कदम प्रदेश के शांतिपूर्ण और समृद्ध भविष्य की दिशा में एक निर्णायक पड़ाव है। जब से हमारी सरकार बनी है, तब से नक्सलवाद के खिलाफ लगातार निर्णायक लड़ाई चल रही है। अब तक 400 से अधिक नक्सली मारे गए और हमारी पुनर्वास नीति के अच्छे नतीजे सामने आए हैं।
आत्मसमर्पण के पीछे पुलिस अधिकारियों का कहना है कि नक्सली संगठन के भीतर भ्रष्टाचार और विचारधारा से मोहभंग। सरकार की योजनाएँ – Poona Margem और Niyad Nellanar जैसी पहल ने रास्ता दिखाया। सुरक्षा बलों की बढ़ती कार्रवाई और गांवों तक प्रशासन की पहुँच ने नक्सलियों का मनोबल तोड़ा। जहाँ भाजपा सरकार और सुरक्षा एजेंसियाँ इसे बड़ी सफलता मान रही हैं, वहीं विपक्षी कांग्रेस ने सवाल खड़े किए हैं।
कांग्रेस नेता दीपक बैज ने तंज कसते हुए कहा है कि “अमित शाह के आने से पहले इतने नक्सली कैसे आत्मसमर्पण कर सकते हैं? सरकार इसे एक इवेंट बनाकर HM अमित शाह के सामने पेश करना चाह रही है। सरकार को सभी 103 नक्सलियों का पूरा प्रोफाइल सार्वजनिक करना चाहिए।
आत्मसमर्पण की इस खुशखबरी के बीच, बीजापुर जिले के पुजारिकांकर गाँव में माओवादियों ने एक ग्रामीण की हत्या कर दी। उस पर पुलिस का मुखबिर होने का शक जताया गया था। यह घटना बताती है कि जंगलों में अब भी माओवादी दहशत पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। बीजापुर का यह सामूहिक आत्मसमर्पण नक्सल मोर्चे पर सरकार और सुरक्षा बलों के लिए एक बड़ा मील का पत्थर है। लेकिन कांग्रेस के आरोप और जंगलों से आती हिंसा की खबरें यह भी संकेत देती हैं कि जंग अभी खत्म नहीं हुई है। क्या यह आत्मसमर्पण नक्सलवाद के खात्मे की शुरुआत है या राजनीति का हिस्सा? यह तो आने वाला वक्त बताएगा।


