बलरामपुर। छत्तीसगढ़ में इन दिनों पुलिस की कार्यशैली को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। कहीं गांजा और ड्रग्स की तस्करी पर पुलिस की भूमिका पर चर्चा हो रही है, तो कहीं सट्टा और अवैध कारोबार को लेकर आरोप लग रहे हैं। ऐसे माहौल में यदि कोई थाना प्रभारी खुद को बेहद ईमानदार साबित करने के लिए पत्रकार को ही नोटिस थमाने लगे, तो स्वाभाविक है कि लोगों के मन में सवाल उठना लाजिमी है। क्या प्रदेश की पुलिस अब इतनी निष्पक्ष और पाक-साफ हो गई है कि किसी समाचार के प्रकाशित होते ही पत्रकारों को ही कटघरे में खड़ा किया जाने लगे?
दरअसल, बलरामपुर जिले के बसंतपुर थाना क्षेत्र में पुलिस और पत्रकारिता के बीच टकराव का मामला सामने आया है। जिस थाना प्रभारी पर गंभीर आरोपों को लेकर समाचार प्रकाशित हुआ, उसी थाना प्रभारी द्वारा अब पत्रकार को ही नोटिस भेज दिया गया है। इस कार्रवाई को लेकर क्षेत्र में कई सवाल खड़े हो रहे हैं और इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर दबाव बनाने की कोशिश बताया जा रहा है।
मामला तब शुरू हुआ जब एक समाचार में बसंतपुर थाना प्रभारी पर आरोप लगाया गया कि चोरी के एक मामले में मुख्य आरोपियों को छोड़ने और अवैध वसूली की बात सामने आई थी। खबर प्रकाशित होने के बाद थाना प्रभारी की कार्यशैली को लेकर क्षेत्र में चर्चा तेज हो गई थी।
इसी खबर से नाराज होकर थाना प्रभारी द्वारा पत्रकार रामहरी गुप्ता को नोटिस जारी कर दिया गया। नोटिस में कहा गया है कि चैनल और सोशल मीडिया के माध्यम से प्रसारित समाचार असत्य और भ्रामक है तथा इससे शासकीय सेवक की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा है। नोटिस में तीन दिनों के भीतर थाना बसंतपुर में उपस्थित होकर स्पष्टीकरण देने को कहा गया है, अन्यथा वैधानिक कार्रवाई की चेतावनी दी गई है।
हालांकि इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि जिस अधिकारी के खिलाफ आरोप लगे हैं, वही अधिकारी खुद नोटिस जारी कर रहे हैं। कानूनी जानकारों और स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि खबर गलत है तो इसकी निष्पक्ष जांच उच्च अधिकारियों से कराई जानी चाहिए, न कि सीधे पत्रकार को नोटिस देकर दबाव बनाने की कोशिश की जाए।
पत्रकारों और सामाजिक संगठनों ने भी इस मामले को गंभीर बताया है। उनका कहना है कि यदि किसी खबर में तथ्यात्मक त्रुटि है तो उसका जवाब तथ्यों और जांच से दिया जाना चाहिए। नोटिस भेजकर पत्रकारों को डराने की कोशिश लोकतंत्र और स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए ठीक संकेत नहीं मानी जा सकती।
स्थानीय लोगों का भी कहना है कि यदि खबर गलत है तो उसकी जांच कराकर सच्चाई सामने लाई जाए। लेकिन जिस अधिकारी पर आरोप हैं, वही कार्रवाई कर रहे हैं, इससे पूरे मामले की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि उच्च पुलिस अधिकारी इस पूरे मामले को किस तरह देखते हैं। क्या आरोपों की निष्पक्ष जांच कराई जाएगी या फिर मामला केवल नोटिस तक ही सीमित रह जाएगा।


