Thursday, 28 May 2026

पेंशन के लिए 90 वर्षीय वृद्धा को पीठ पर ढो रही बहू

मैनपाट की तस्वीर ने खोली ‘सुशासन’ और ‘अच्छे दिनों’ की हकीकत

अंबिकापुर/मैनपाट। एक ओर सरकारें डिजिटल इंडिया, सुशासन और घर-घर योजनाओं का ढोल पीट रही हैं, वहीं दूसरी ओर सरगुजा जिले के मैनपाट से सामने आई एक तस्वीर इन तमाम दावों की परतें उधेड़ रही है। यह तस्वीर केवल एक परिवार की मजबूरी नहीं, बल्कि उस सरकारी व्यवस्था का आईना है जहाँ बुजुर्गों और गरीबों के लिए संवेदनाएं नहीं, सिर्फ नियम बच गए हैं।

मामला मैनपाट ब्लॉक के ग्राम कुनिया जंगलपारा का है। यहाँ रहने वाली सुखमनिया बाई अपनी 90 वर्षीय बुजुर्ग सास को हर महीने पेंशन दिलाने के लिए पीठ पर लादकर कई किलोमीटर का कठिन सफर तय करने को मजबूर हैं। बताया जा रहा है कि वृद्धा चलने-फिरने में पूरी तरह असमर्थ हैं, लेकिन बैंक के नियमों के कारण उन्हें स्वयं उपस्थित होना अनिवार्य है ताकि फिंगरप्रिंट और भौतिक सत्यापन किया जा सके।

इसी मजबूरी के चलते सुखमनिया बाई इस बार भी अपनी सास को पीठ पर बैठाकर करीब 9 किलोमीटर दूर स्थित नर्मदापुर सेंट्रल बैंक तक पहुंचीं। रास्ता इतना कठिन है कि बीच में पथरीले मार्ग, जंगल और नदी-नाले पड़ते हैं। तपती धूप और बदहाल रास्तों के बीच बहू अपनी वृद्ध सास को पीठ पर लेकर चलती रही, जबकि सरकारी योजनाओं और संवेदनशील प्रशासन के दावे कागजों में दम तोड़ते नजर आए।

ग्रामीणों का कहना है कि यह कोई पहली घटना नहीं है। पिछले कई महीनों से सुखमनिया बाई इसी तरह अपनी सास को बैंक तक लेकर जाती हैं। गांव के लोगों ने कई बार प्रशासन और बैंक प्रबंधन से मांग की कि इतनी बुजुर्ग और असहाय महिला के लिए घर पहुंच सेवा या वैकल्पिक सत्यापन की व्यवस्था की जाए, लेकिन अब तक कोई समाधान नहीं निकला।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सरकार डिजिटल सेवाओं, मोबाइल बैंकिंग और घर-घर सुविधा देने की बात करती है, तब मैनपाट जैसे वनांचल क्षेत्रों में बुजुर्गों को पेंशन पाने के लिए अपनी शारीरिक पीड़ा का प्रमाण क्यों देना पड़ रहा है? क्या सुशासन केवल विज्ञापनों और भाषणों तक सीमित रह गया है? क्या ‘अच्छे दिन’ केवल शहरों के लिए हैं, जबकि दूरस्थ गांवों में रहने वाले गरीब और बुजुर्ग आज भी व्यवस्था के बोझ तले दबे हुए हैं?

यह घटना प्रशासनिक संवेदनहीनता की बड़ी मिसाल बन गई है। एक ओर सरकार बुजुर्गों के सम्मान और सामाजिक सुरक्षा की बात करती है, दूसरी ओर 90 साल की वृद्धा को पेंशन के नाम पर पीठ पर ढोकर बैंक लाना पड़ रहा है। इससे यह भी साफ हो गया है कि ग्रामीण और वनांचल क्षेत्रों में योजनाओं की जमीनी स्थिति कितनी दयनीय है।

सोशल मीडिया पर इस घटना का वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है। लोग सरकार और बैंकिंग व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं। कई लोगों ने इसे “सुशासन की असली तस्वीर” बताते हुए कहा कि यदि एक बुजुर्ग महिला को पेंशन के लिए इतनी यातना झेलनी पड़ रही है, तो यह व्यवस्था के लिए शर्मनाक स्थिति है।

अब देखना होगा कि प्रशासन इस मामले में केवल जांच और आश्वासन तक सीमित रहता है या वास्तव में ऐसे बुजुर्गों के लिए मानवीय और सरल व्यवस्था लागू की जाती है, ताकि किसी बहू को अपनी बूढ़ी सास को पीठ पर ढोकर पेंशन लेने न जाना पड़े।

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