सरकारी काबिल काश्त भूमि की खरीद-बिक्री पर फिर सवाल, पटवारी-आरआई और रजिस्ट्रार की भूमिका जांच के घेरे में
महासमुंद। ग्राम सरीफाबाद में सरकारी काबिल काश्त भूमि की खरीद-बिक्री का मामला थमने का नाम नहीं ले रहा है। एक के बाद एक नए खुलासे हो रहे हैं और हर बार जमीन कारोबारी निखिल अग्रवाल का नाम सामने आ रहा है। ताजा मामला ग्राम पंचायत के खसरा नंबर 323 की 1.65 हेक्टेयर भूमि का है, जिसे ग्रामीण निस्तारी तालाब बता रहे हैं। आरोप है कि इस तालाब की जमीन को कृषि भूमि दर्शाकर निखिल अग्रवाल के नाम बेच दिया गया। 15 जनवरी 2026 को इसकी रजिस्ट्री भी हो गई, जिसमें 20 लाख रुपये कीमत दर्ज है।
सवाल यह है कि गांव के निस्तारी तालाब की जमीन कृषि भूमि कैसे बन गई? सरकारी काबिल काश्त भूमि की वास्तविक स्थिति की जांच किए बिना रजिस्ट्री कैसे हो गई? क्या पटवारी, आरआई और पंजीयन कार्यालय ने दस्तावेजों के साथ मौके की वास्तविक स्थिति का परीक्षण किया था? ग्रामीणों को जब इस खरीदी-बिक्री की जानकारी मिली तो उन्होंने कलेक्टर विनय कुमार लंगेह से शिकायत की, जिस पर जांच के आदेश दिए गए हैं।
गौरतलब है कि सरीफाबाद में निखिल अग्रवाल की जमीन खरीद को लेकर यह पहला विवाद नहीं है। इससे पहले भी ग्रामीणों की जमीन के गलत हस्तांतरण और खरीद-बिक्री के मामले सामने आ चुके हैं, जो अब रायपुर राजस्व मंडल तक पहुंच गए हैं। पुराने विवादों का निराकरण भी नहीं हुआ और अब निस्तारी तालाब की जमीन की रजिस्ट्री ने पूरे मामले को फिर सुर्खियों में ला दिया है।
किसानों ने पूर्व में 30 एकड़ से अधिक भूमि की खरीद-बिक्री पर आपत्ति जताई थी, जबकि करीब 150 एकड़ में गड़बड़ी की आशंका व्यक्त की गई है। अब सवाल सिर्फ निखिल अग्रवाल द्वारा जमीन खरीदने का नहीं, बल्कि उस पूरी सरकारी प्रक्रिया का है, जिसके जरिए निस्तारी तालाब कृषि भूमि बनकर रजिस्ट्री तक पहुंच गया। आखिर किसके दस्तावेजों और प्रतिवेदन के आधार पर यह सौदा हुआ? क्या राजस्व अमले की भूमिका की निष्पक्ष जांच होगी? और यदि नियमों की अनदेखी हुई है, तो जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई कब होगी?
सरीफाबाद का यह मामला अब एक रजिस्ट्री तक सीमित नहीं रह गया है। ग्रामीणों की मांग है कि निखिल अग्रवाल के नाम हुई विवादित जमीनों की खरीद-बिक्री, राजस्व रिकॉर्ड में बदलाव और पंजीयन प्रक्रिया की व्यापक जांच कराई जाए।


