अम्बिकापुर, सरगुजा। जनहित के मुद्दे उठाने वाले पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और सोशल मीडिया इंफ्लूएंसर्स के खिलाफ दर्ज शिकायतों की निष्पक्ष जांच की मांग उठी है। आवेदनकर्ताओं ने मुख्यमंत्री, गृह मंत्री, डीजीपी, आईजी रेंज सरगुजा और पुलिस अधीक्षक सरगुजा को आवेदन सौंपे जाने का उल्लेख किया है।
आवेदन में आशंका जताई गई है कि शिकायतों और कथित अपमानजनक टिप्पणियों के जरिए जनहित के मुद्दे उठाने वालों पर दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है। आवेदनकर्ताओं का कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता जनसमस्याओं को अधिकारियों तक पहुंचाने और प्रशासनिक जवाबदेही के सवाल उठाने का काम करते हैं, इसलिए उनके खिलाफ किसी भी शिकायत की जांच तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर होनी चाहिए। साथ ही यह भी कहा गया है कि किसी शिकायत का दुर्भावनापूर्ण होना या चरित्र-हनन का आरोप जांच का विषय है।
आवेदन में जोर दिया गया है कि एक ही क्षेत्र में काम करने वाले पत्रकारों, एक्टिविस्टों और इंफ्लूएंसर्स के बीच किसी घटना को लेकर संपर्क होना, जानकारी साझा करना या किसी पोस्ट को आगे बढ़ाना सामान्य गतिविधि हो सकती है। केवल इस आधार पर आपराधिक षड्यंत्र का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। किसी पोस्ट, वीडियो या ऑडियो के आधार पर आरोप लगे हों, तो उसके संदर्भ, स्रोत और प्रसार की परिस्थितियों की भी जांच होनी चाहिए।
आवेदन में अम्बिकापुर के कोतवाली और अजाक थाने में 4 अक्टूबर 2026 को दर्ज चार प्राथमिकियों की समीक्षा की मांग की गई है। इनमें एफआईआर क्रमांक 0702/2026 (कोतवाली) शाम 6:04 बजे दर्ज हुई, जिसमें आकांक्षा टोप्पो शिकायतकर्ता और धीरज सिंह नामजद हैं तथा बीएनएस व एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के प्रावधानों का उल्लेख है। एफआईआर क्रमांक 0015/2026 (अजाक थाना) रात 9:26 बजे दर्ज हुई, जिसमें सुनीता सोनहा शिकायतकर्ता और रविन्द्र तिवारी नामजद हैं।
इसके अलावा एफआईआर क्रमांक 0703/2026 (कोतवाली) रात 9:32 बजे दर्ज हुई, जिसमें शैलेन्द्र शर्मा शिकायतकर्ता हैं और आकांक्षा टोप्पो, अकील अहमद अंसारी व अन्य के नाम शामिल बताए गए हैं। चौथी एफआईआर क्रमांक 0704/2026 (कोतवाली) रात 10:38 बजे दर्ज हुई, जिसमें धीरज सिंह शिकायतकर्ता हैं और आकांक्षा टोप्पो तथा कैमरामैन दिनेश यादव नामजद हैं। आवेदनकर्ताओं ने इन्हें एक ही घटनाक्रम के संदर्भ में जोड़कर देखने और प्रत्येक नामजद व्यक्ति की भूमिका की अलग-अलग जांच करने की मांग की है।
आवेदन में कहा गया है कि परस्पर विरोधी शिकायतों की स्थिति में हर शिकायत के आरोपों का अलग-अलग परीक्षण जरूरी है। एफआईआर दर्ज होने भर से आरोप प्रमाणित नहीं हो जाते, और बिना जांच किसी शिकायत को झूठा भी नहीं ठहराया जा सकता। इसके लिए घटनाक्रम का क्रम, शिकायत दर्ज होने का समय, पक्षों के बयान तथा वीडियो-ऑडियो रिकॉर्डिंग और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य अहम होंगे।
डिजिटल साक्ष्यों को लेकर मांग की गई है कि ऑडियो, वीडियो, स्क्रीनशॉट, सोशल मीडिया पोस्ट और संदेशों की प्रामाणिकता की जांच आवश्यकतानुसार विशेषज्ञों से कराई जाए। मूल फाइल, मेटाडेटा और संबंधित डिवाइस की जांच से संपादित या संदर्भ से अलग सामग्री के आधार पर अनुचित कार्रवाई की आशंका दूर हो सकेगी। आवेदनकर्ताओं ने यह भी कहा कि किसी पक्ष को उसकी सामाजिक या पेशेवर पहचान के आधार पर न परखा जाए।
आवेदनकर्ताओं ने मांग की है कि गंभीर आपराधिक धाराओं का प्रयोग केवल कानून और साक्ष्य के अनुरूप हो, विवेचना पारदर्शी रहे और सभी पक्षों को अपनी बात रखने का अवसर मिले। उनका कहना है कि पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ शिकायतकर्ताओं के अधिकारों की भी रक्षा होनी चाहिए, क्योंकि अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शिकायत दर्ज कराने का अधिकार, दोनों कानून से संरक्षित हैं। उन्होंने मांग की कि दोषी पाए जाने वालों पर कानून के अनुसार कार्रवाई हो और निर्दोषों के अधिकार सुरक्षित रहें।


