Saturday, 7 Mar 2026

संविदा नियुक्ति पर घमासान : चौथी बार रिटायर अधिकारी को जिम्मेदारी, नियमों की अनदेखी से प्रशासनिक सेवा संघ नाराज़

विशेष प्रतिनिधि

रायपुर। छत्तीसगढ़ में संविदा नियुक्तियों को लेकर एक बार फिर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। छत्तीसगढ़ प्रशासनिक सेवा संघ (CASA) ने जिलों में संविदा पर पदस्थ अपर कलेक्टरों की नियुक्ति समाप्त करने की मांग उठाई है। मामला तब गरमा गया जब बेमेतरा जिले में हाल ही में जारी कार्यविभाजन आदेश में एक संविदा अधिकारी को न केवल प्रमुख वित्तीय विभागों की जिम्मेदारी दी गई, बल्कि राजस्व न्यायालय का कार्यभार भी सौंप दिया गया।

कलेक्टर का आदेश और बढ़ा विवाद

1 सितम्बर को बेमेतरा कलेक्टर द्वारा जारी कार्यविभाजन आदेश जैसे ही राज्य प्रशासनिक सेवा अधिकारियों के व्हाट्सएप ग्रुप में पहुँचा, चर्चा तेज हो गई। आदेश के मुताबिक संविदा अधिकारी को वित्तीय प्रभार और राजस्व न्यायालय की जिम्मेदारी सौंपी गई है, जबकि नियमों के अनुसार यह कार्य केवल नियमित अधिकारियों को ही दिया जा सकता है।

संवैधानिक प्रावधानों की अनदेखी

संविधान और सेवा नियमों में यह स्पष्ट है कि सेवानिवृत्ति के बाद संविदा नियुक्ति केवल अपवादस्वरूप और सीमित अवधि के लिए ही दी जा सकती है। बावजूद इसके सूत्रों का दावा है कि एक रिटायर अधिकारी को चौथी बार संविदा पर नियुक्त करने की सिफारिश की गई है। इस मामले में जिला कलेक्टर, एक वरिष्ठ मंत्री और सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) सचिव की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं।

CMO तक पहुँची फाइल

जानकारी के मुताबिक संविदा नियुक्ति से जुड़ी फाइल अब सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय पहुँच चुकी है और “सुशासन बाबू” के निर्णय का इंतजार है।

CASA का विरोध, लेकिन फाइल आगे

प्रशासनिक सेवा संघ ने इस नियुक्ति का विरोध करते हुए GAD सचिव को पत्र लिखा। हालांकि, सूत्र बताते हैं कि विवादित अधिकारी ने सचिव से निजी मुलाकात की, जिसके बाद संघ की आपत्ति दरकिनार कर दी गई। इससे संघ और अधिक नाराज़ है और इसे नियमित अधिकारियों के अधिकारों का हनन मान रहा है।

करोड़ों का खेल’ का आरोप

सूत्रों का कहना है कि संविदा नियुक्ति अब “करोड़ों का खेल” बन चुकी है। बेमेतरा में दो ADM पहले से पदस्थ हैं, जिनका भविष्य प्रशासनिक सेवा में है, लेकिन उन्हें नज़रअंदाज़ कर संविदा अधिकारी को सबसे शक्तिशाली विभाग सौंपे गए हैं। सूत्रों का दावा है कि इस नियुक्ति के पीछे महज प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि “वसूली तंत्र” को मजबूत करना है।

मुख्य सवाल

जब पर्याप्त संख्या में नियमित अधिकारी मौजूद हैं, तो संविदा नियुक्तियों की जरूरत क्यों?

क्या संविदा नियुक्ति अब राजनीतिक संरक्षण और वसूली का माध्यम बन चुकी है?

मुख्यमंत्री कार्यालय इस पर क्या फैसला करेगा?

बेमेतरा का यह मामला न केवल प्रशासनिक सेवा संघ और सरकार के बीच टकराव का कारण बन रहा है, बल्कि संविदा नियुक्तियों की पारदर्शिता और वैधता पर भी गंभीर सवाल खड़ा कर रहा है।

 

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