अध्यक्ष पति पर दो-तीन लाख रुपये मांगने का आरोप, सचिव के खिलाफ एफआईआर; महिला जनप्रतिनिधियों के अधिकारों पर पतियों का कब्जा और प्रशासन की चुप्पी पर उठे सवाल
महासमुंद। जनपद पंचायत महासमुंद की अध्यक्ष दिशा दीवान के पति रामस्वरूप दीवान और ग्राम पंचायत खट्टा के सचिव द्वारिका निषाद के बीच विवाद अब थाने तक पहुंच गया है। अध्यक्ष पति की शिकायत पर सचिव के खिलाफ गाली-गलौज और जान से मारने की धमकी देने के आरोप में एफआईआर दर्ज कराई गई है। वहीं सचिव ने पुलिस अधीक्षक को आवेदन देकर अध्यक्ष पति पर निर्माण कार्य के एवज में दो-तीन लाख रुपये मांगने और आए दिन पार्टी करवाने का दबाव बनाने का आरोप लगाया है।
सूत्रों के अनुसार विवाद की जड़ जनपद अध्यक्ष निधि से स्वीकृत निर्माण कार्य और ठेकेदार को भुगतान को लेकर है। आरोप है कि अध्यक्ष पति ने अपने पसंदीदा ठेकेदार को काम सौंपने का निर्देश दिया था। ठेकेदार द्वारा निर्माण शुरू होने से पहले ही राशि जारी करने का दबाव बनाए जाने पर सचिव ने पहले निर्माण सामग्री पंचायत में पहुंचाने की शर्त रखी। इसी बात को लेकर विवाद बढ़ा और मामला पुलिस तक पहुंच गया। कथित कमीशन और लेन-देन के आरोपों की जांच होना अभी बाकी है।
महिला जनप्रतिनिधि के नाम पर पति क्यों चला रहे सत्ता? यह विवाद केवल अध्यक्ष पति और सचिव के बीच का नहीं, बल्कि पंचायत व्यवस्था में कथित समानांतर सत्ता संचालन का गंभीर मामला है। महासमुंद जनपद पंचायत में महिला जनप्रतिनिधियों के स्थान पर उनके पतियों और रिश्तेदारों की सक्रियता को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। आखिर निर्वाचित महिला प्रतिनिधि स्वयं निर्णय लेने और अधिकारियों से संवाद करने में सक्षम क्यों नहीं दिखाई देतीं? क्या जनता ने प्रतिनिधि चुना है या उनके पतियों को अघोषित अधिकार सौंप दिए हैं?
अधिकारियों की चुप्पी आखिर क्यों?
जिला और जनपद पंचायत के अधिकारियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। यदि जनप्रतिनिधियों के परिजन सरकारी कामकाज में हस्तक्षेप कर रहे हैं, तो सीईओ और प्रशासनिक अधिकारी अब तक मौन क्यों हैं? क्या किसी जनप्रतिनिधि का पति पंचायत सचिव को निर्देश देने, ठेकेदार तय करने या भुगतान के लिए दबाव बनाने का संवैधानिक अधिकार रखता है?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब महिला जनप्रतिनिधि के नाम पर निधि स्वीकृत होती है, तो निर्णय लेने की कमान उनके पति के हाथों में क्यों दिखाई देती है? खट्टा पंचायत प्रकरण में दोनों पक्षों के आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। निर्माण कार्य की प्रक्रिया, कथित आर्थिक लेन-देन और भुगतान के दबाव की सच्चाई सामने आनी चाहिए। साथ ही प्रशासन को यह भी स्पष्ट करना होगा कि पंचायतों में निर्वाचित प्रतिनिधियों के परिजनों के अनधिकृत हस्तक्षेप पर रोक लगाने के लिए अब तक क्या कार्रवाई की गई है।
जनता के वोट से मिला अधिकार किसी परिवार की निजी जागीर नहीं है। पंचायत व्यवस्था में जवाबदेही प्रतिनिधि की होनी चाहिए, न कि पर्दे के पीछे से सत्ता चलाने वालों की।
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा लंबे समय से होती रही है कि अनेक महिला जनप्रतिनिधियों के स्थान पर उनके पति ही पंचायत और जनपद से जुड़े कार्यों में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। जनपद पंचायत कार्यालय में महिला जनप्रतिनिधियों के साथ उनके पतियों की सक्रिय मौजूदगी और अधिकारियों से उनके माध्यम से होने वाले संवाद को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। यदि निर्वाचित महिला जनप्रतिनिधि स्वयं निर्णय लेने में सक्षम हैं, तो उनके स्थान पर पति या रिश्तेदार अधिकारियों और कर्मचारियों से निर्देशात्मक भूमिका में संवाद क्यों करते हैं? क्या यह महिला जनप्रतिनिधियों की राजनीतिक और प्रशासनिक स्वतंत्रता को सीमित करने जैसा नहीं है? महिला आरक्षण और राजनीतिक भागीदारी का उद्देश्य महिलाओं को नेतृत्व का अवसर देना है, न कि उनके नाम पर किसी अन्य व्यक्ति द्वारा सत्ता और अधिकारों का संचालन करना।


