Thursday, 17 Sep 2026

झीरम घाटी हत्याकांड: 13 साल बाद 10 दोषियों को फांसी की सजा

NIA की विशेष अदालत का बड़ा फैसला, कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व पर हुए हमले में 101 गवाहों की गवाही और 294 सुनवाइयों के बाद आया निर्णय

जगदलपुर/रायपुर। छत्तीसगढ़ के इतिहास के सबसे भयावह राजनीतिक और नक्सली हमलों में शामिल झीरम घाटी हत्याकांड में आखिरकार 13 साल बाद अदालत का फैसला सामने आया है। जगदलपुर स्थित राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (NIA) की विशेष अदालत ने 16 सितंबर 2026 को मामले में दोषी ठहराए गए सभी 10 आरोपियों को मृत्युदंड की सजा सुनाई। इससे पहले 5 सितंबर को विशेष न्यायाधीश अजय सिंह राजपूत की अदालत ने सभी 10 आरोपियों को दोषी करार दिया था और सजा के बिंदु पर फैसला 16 सितंबर के लिए सुरक्षित रखा था।

25 मई 2013 को हुआ था दिल दहला देने वाला हमला

25 मई 2013 को कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा का काफिला सुकमा से लौट रहा था। बस्तर के दरभा थाना क्षेत्र स्थित झीरम घाटी में माओवादियों ने कांग्रेस नेताओं के काफिले को घेरकर हमला किया। जांच के अनुसार हमले में बड़ी संख्या में सशस्त्र माओवादी शामिल थे। हमले में आईईडी विस्फोट, गोलीबारी और ग्रेनेड का इस्तेमाल किया गया तथा रास्ते को पेड़ गिराकर बाधित किया गया था। इस हमले का निशाना कांग्रेस का राजनीतिक नेतृत्व था। तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, उनके पुत्र दिनेश पटेल, वरिष्ठ कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा, तत्कालीन विधायक उदय मुदलियार सहित कई नेता और सुरक्षाकर्मी मारे गए। पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल भी हमले में गंभीर रूप से घायल हुए थे और बाद में उनकी मृत्यु हो गई।

हमले में कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व हुआ था प्रभावित

झीरम घाटी हमला केवल एक नक्सली वारदात नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के राजनीतिक इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में गिना जाता है। एक ही हमले में कांग्रेस के कई शीर्ष नेताओं की मौत ने पूरे प्रदेश की राजनीति को हिला दिया था। हमले में महेंद्र कर्मा, जिन्हें सलवा जुडूम आंदोलन से जोड़ा जाता था, विशेष रूप से निशाने पर थे। नंदकुमार पटेल और उनके पुत्र दिनेश पटेल तथा उदय मुदलियार समेत अनेक लोगों की हत्या हुई। हमले में सुरक्षाकर्मी और अन्य लोग भी मारे गए तथा बड़ी संख्या में लोग घायल हुए।

13 साल चली कानूनी लड़ाई

झीरम घाटी मामले की जांच बाद में राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण को सौंपी गई। NIA ने 2014 में पहली आरोप-पत्र दाखिल की और 2015 में पूरक आरोप-पत्र पेश किया। जांच में बड़ी संख्या में आरोपियों के नाम सामने आए। मुकदमे के दौरान 101 अभियोजन गवाहों के बयान दर्ज किए गए और करीब 294 सुनवाइयां हुईं।मामले में कुल 11 गिरफ्तार आरोपियों के खिलाफ सुनवाई शुरू हुई थी। इनमें से एक आरोपी की मुकदमे के दौरान मौत हो गई। इसके बाद बचे 10 आरोपियों को 5 सितंबर 2026 को दोषी ठहराया गया।

इन 10 दोषियों को मिली मृत्युदंड की सजा, अदालत ने जिन 10 आरोपियों को मृत्युदंड सुनाया है, उनमें—

– प्रमिला मोडियाम- चैतू लेकाम उर्फ मुन्ना, सुमिता उर्फ पुनेम मोडियाम, मुक्का मंडवी,कोसा कवासी उर्फ कोसाराम,आयता मरकाम, मड़कमि देवा, जोगा मड़कमि,बंजामी सन्ना उर्फ चमरू, महादेव नाग शामिल हैं।

कई गंभीर धाराओं में दोषसिद्धि

NIA की जानकारी के अनुसार दोषियों को भारतीय दंड संहिता, शस्त्र अधिनियम, विस्फोटक पदार्थ अधिनियम और गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA की विभिन्न धाराओं के तहत दोषी ठहराया गया। रिपोर्टों के अनुसार मामले में हत्या, हत्या का प्रयास, आपराधिक षड्यंत्र, डकैती/हिंसक अपराध, हथियार और विस्फोटक से संबंधित गंभीर धाराएं लगाई गई थीं। मृत्युदंड विशेष रूप से IPC की धारा 120-B और 302 के तहत सुनाया गया।

फैसले के बाद भी कानूनी प्रक्रिया बाकी

अदालत से मृत्युदंड की सजा सुनाए जाने के बावजूद मामला यहीं समाप्त नहीं होता। बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील करने की बात कही है। रिपोर्टों के अनुसार दोषियों को अपील के लिए 30 दिन का समय मिलेगा। मृत्युदंड के क्रियान्वयन से पहले उच्च न्यायालय की न्यायिक प्रक्रिया पूरी होना आवश्यक है।

 

इस तरह 16 सितंबर 2026 का फैसला झीरम घाटी मामले की करीब 13 वर्ष लंबी न्यायिक प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, लेकिन अंतिम कानूनी स्थिति आगे की अपील और न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगी।

28 अन्य आरोपी अब भी मामले में महत्वपूर्ण कड़ी

NIA की चार्जशीट में नामजद सभी आरोपी इस मुकदमे में अदालत के सामने नहीं पहुंचे। रिपोर्टों के अनुसार 28 अन्य आरोपी वांछित बताए गए हैं। इनमें कुछ बड़े माओवादी नाम भी शामिल रहे हैं। कुछ के आत्मसमर्पण करने और कुछ के मुठभेड़ में मारे जाने की जानकारी भी सामने आई है। यही वजह है कि 10 आरोपियों को सजा मिलने के बावजूद झीरम घाटी मामले की जांच और उससे जुड़े व्यापक सवाल पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं।

फैसले पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं

अदालत के फैसले के बाद जहां सरकार की ओर से इसे न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया गया, वहीं पीड़ित परिवारों और राजनीतिक पक्षों से यह सवाल भी उठाया गया कि घटना से जुड़े अन्य आरोपियों और कथित व्यापक साजिश की जांच का क्या हुआ। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने फैसले के बाद जांच के दायरे को लेकर सवाल उठाए और व्यापक साजिश की जांच की आवश्यकता बताई। दूसरी ओर उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने अदालत के फैसले को NIA की जांच की पुष्टि के रूप में देखा। ये दोनों राजनीतिक प्रतिक्रियाएं हैं; अदालत के फैसले में दोषसिद्ध 10 आरोपियों के खिलाफ न्यायिक निष्कर्ष अलग विषय है।

झीरम घाटी का फैसला: एक अध्याय पूरा, लेकिन कानूनी प्रक्रिया अभी बाकी

13 साल पहले हुए इस हमले ने छत्तीसगढ़ के राजनीतिक इतिहास पर गहरी छाप छोड़ी थी। अब NIA की विशेष अदालत द्वारा 10 दोषियों को मृत्युदंड दिए जाने से मामले में एक बड़ा न्यायिक पड़ाव आया है। हालांकि, उच्च न्यायालय में संभावित अपील और अन्य वांछित आरोपियों से जुड़े सवालों के कारण झीरम घाटी प्रकरण की पूरी कानूनी कहानी अभी समाप्त नहीं हुई है।

25 मई 2013 की वह घटना आज भी छत्तीसगढ़ के इतिहास में लोकतांत्रिक व्यवस्था और राजनीतिक नेतृत्व पर हुए सबसे गंभीर हमलों में दर्ज है। 16 सितंबर 2026 का फैसला उस घटना से जुड़ी न्यायिक प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण अध्याय बन गया है।

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