Thursday, 28 May 2026

महासमुंद का सबसे बड़ा एलपीजी घोटाला, सरकारी कुर्सी पर बैठा मास्टरमाइंड और करोड़ों की गैस का खेल

महासमुंद। यह सिर्फ गैस चोरी नहीं थी… यह सरकारी सिस्टम के भीतर बैठकर रचा गया ऐसा संगठित षड्यंत्र था, जिसने प्रशासनिक व्यवस्था पर ही सवाल खड़े कर दिए। करोड़ों रुपये की एलपीजी गैस को गायब करने के लिए ऐसी पटकथा लिखी गई, जिसमें सरकारी दस्तावेज, सुपुर्दनामा, फर्जी पंचनामा, पैसों की डील और प्रभावशाली लोगों का पूरा नेटवर्क शामिल था। लेकिन 15 दिनों की गहन और हाईटेक जांच के बाद महासमुंद पुलिस ने इस पूरे खेल का पर्दाफाश कर दिया।

इस सनसनीखेज मामले में सबसे चौंकाने वाला नाम सामने आया जिला खाद्य अधिकारी अजय यादव का, जो जांच में पूरे गैस गबन कांड का मास्टरमाइंड निकला। जिस अधिकारी पर सरकारी संपत्ति की सुरक्षा और निगरानी की जिम्मेदारी थी, वही करोड़ों की गैस को ठिकाने लगाने की पूरी साजिश का सूत्रधार बन गया। पूरे मामले की शुरुआत तब हुई जब सिंघोड़ा थाना क्षेत्र में 6 एलपीजी गैस से भरे कैप्सूल ट्रकों को सुरक्षा कारणों से जब्त किया गया। प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत इन्हें सुरक्षित रखने और सुपुर्दनामा में देने की कार्रवाई शुरू हुई। यहीं से अजय यादव ने अपने करीबी लोगों के साथ मिलकर गैस गबन की योजना तैयार की।

पुलिस जांच में खुलासा हुआ कि 23 मार्च को पहली गुप्त बैठक हुई, जिसमें खाद्य अधिकारी अजय यादव और गौरव गैस एजेंसी संचालक पंकज चंद्राकर ने करोड़ों के खेल की पूरी रणनीति बनाई। अजय यादव ने खुद पूरे ऑपरेशन की रूपरेखा तैयार की और गैस को खपाने के लिए एजेंसियों से संपर्क साधने की जिम्मेदारी रायपुर के मनीष चौधरी को दी गई।

26 मार्च को अजय यादव और पंकज चंद्राकर सिंघोड़ा पहुंचे और कैप्सूलों में मौजूद गैस का आकलन किया। जांच में सामने आया कि 6 कैप्सूलों में लगभग 105 मीट्रिक टन गैस भरी हुई थी। इतनी बड़ी मात्रा देखकर आरोपियों ने करोड़ों की कमाई का खेल शुरू कर दिया। कई एजेंसियों से बातचीत के बाद आखिरकार ठाकुर पेट्रोकेमिकल्स के साथ करीब 80 लाख रुपये में डील फाइनल हुई।

जांच में यह भी सामने आया कि इस पूरी रकम का सबसे बड़ा हिस्सा खुद अजय यादव के लिए तय किया गया था। पुलिस के अनुसार, 80 लाख रुपये की डील में 50 लाख रुपये अजय यादव के हिस्से में आने थे, जबकि पंकज चंद्राकर और मनीष चौधरी को क्रमशः 20 और 10 लाख रुपये मिलने थे। रकम के लेन-देन को बेहद गोपनीय तरीके से अंजाम दिया गया और सुरिटी के नाम पर खातों में पैसे ट्रांसफर किए गए।

लेकिन यह खेल सिर्फ गैस तक सीमित नहीं था। पूरे मामले को वैध दिखाने के लिए फर्जी दस्तावेजों का सहारा लिया गया। पुलिस जांच में सामने आया कि गैस निकालने के बाद खाली कैप्सूलों का वजन कराया गया, लेकिन उससे पहले ही फर्जी पंचनामा तैयार कर लिया गया था। इतना ही नहीं, खाद्य विभाग के कर्मचारियों को पंचनामा में हस्ताक्षर नहीं करने के निर्देश दिए गए थे। वास्तविक वजन प्रक्रिया से पहले ही दस्तावेज तैयार कर कलेक्टोरेट में जमा करा दिए गए थे।पूरे मामले का सबसे बड़ा पहलू यह रहा कि आरोपियों ने सरकारी प्रक्रिया का इस्तेमाल करके अपराध को वैध दिखाने की कोशिश की। लेकिन महासमुंद पुलिस ने तकनीकी जांच और वैज्ञानिक तरीके से पूरी साजिश की परतें खोल दीं।

महासमुंद पुलिस अधीक्षक प्रभात कुमार ने इस हाईप्रोफाइल मामले को गंभीरता से लेते हुए विशेष टीम गठित की। करीब 40 सदस्यीय टीम ने लगातार 15 दिनों तक टेक्निकल एनालिसिस, सीडीआर जांच, साइंटिफिक इंटरोगेशन और दस्तावेजी जांच की। पुलिस ने कॉल रिकॉर्ड, बैठकों का समय, पैसों के ट्रांजेक्शन और फर्जी पंचनामों की कड़ियों को जोड़ते हुए पूरे षड्यंत्र का खुलासा कर दिया।

इस जटिल और संवेदनशील मामले का खुलासा महासमुंद पुलिस की बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। पुलिस अधीक्षक प्रभात कुमार की रणनीतिक निगरानी, तकनीकी जांच और सटीक नेतृत्व की अब हर स्तर पर सराहना हो रही है। प्रभावशाली लोगों और सरकारी तंत्र से जुड़े आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई कर महासमुंद पुलिस ने यह साबित कर दिया कि कानून से बड़ा कोई नहीं होता।

पुलिस ने मामले में जिला खाद्य अधिकारी अजय कुमार यादव, गौरव गैस एजेंसी संचालक पंकज चंद्राकर और मनीष चौधरी को गिरफ्तार किया है। आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की गंभीर धाराओं और आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया है। पुलिस अब इस पूरे नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों की भूमिका की भी जांच कर रही है। महासमुंद का यह गैस घोटाला अब सिर्फ आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र में बैठे भ्रष्ट नेटवर्क की भयावह तस्वीर बन चुका है, जहां कुर्सी और सत्ता का इस्तेमाल जनता की संपत्ति लूटने के लिए किया गया।

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