जांच तक रोक के निर्देश थे, फिर भी उप पंजीयक कार्यालय में हुई रजिस्ट्री — पटवारी व जनप्रतिनिधियों पर मिलीभगत के आरोप
महासमुंद। जिले के पिथौरा विकासखंड अंतर्गत ग्राम सरीफाबाद में शासकीय पट्टे की जमीन को लेकर गंभीर अनियमितताओं का मामला सामने आया है। भूमिहीन किसानों को जीवनयापन के लिए आवंटित जमीन अब कथित रूप से भ्रष्टाचार और मिलीभगत के चलते अवैध खरीदी-बिक्री का माध्यम बनती जा रही है। किसानों ने पटवारी, उप पंजीयक और कुछ स्थानीय जनप्रतिनिधियों पर संगठित तरीके से जमीन हड़पने का आरोप लगाया है।
मामले के अनुसार, वर्ष 1978 में शासन द्वारा लगभग 150 एकड़ भूमि भूमिहीन किसानों को काबिल काश्त के लिए दी गई थी। दशकों से किसान इस जमीन पर खेती कर अपने परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं। लेकिन अब आरोप है कि उन्हें जमीन बेचने के लिए दबाव बनाया जा रहा है और मना करने पर फर्जी तरीके से नामांतरण कर जमीन दूसरे लोगों के नाम पर दर्ज कर बेची जा रही है।
ग्रामीणों ने बताया कि उन्होंने इस गड़बड़ी की शिकायत कलेक्टर से की थी, जिसके बाद कलेक्टर द्वारा जिला पंजीयक को स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि जांच पूरी होने तक ग्राम सरीफाबाद की जमीनों की रजिस्ट्री पर रोक लगाई जाए। 2 अप्रैल को इस संबंध में आदेश भी जारी किया गया था। इसके बावजूद आरोप है कि पिथौरा उप पंजीयक कार्यालय में बिना जांच के ही जमीनों की रजिस्ट्री कर दी गई। ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें इसकी जानकारी तक नहीं दी गई और उनकी जमीन दूसरे व्यक्तियों के नाम पर दर्ज कर बेच दी गई।
पीड़ित किसान धनसाय ने बताया कि उन्हें खसरा नंबर 327 की लगभग 2 एकड़ 15 डिसमिल जमीन आवंटित हुई थी, जिसकी ऋण पुस्तिका उनके पास आज भी सुरक्षित है। इसके बावजूद उनकी जमीन किसी अन्य व्यक्ति के नाम पर दर्ज कर दी गई। इसी तरह गोपीचंद ने आरोप लगाया कि उनके पिता के नाम दर्ज खसरा नंबर 328 की जमीन भी अब ऑनलाइन रिकॉर्ड में किसी और के नाम पर दिख रही है। किसानों का कहना है कि ‘त्रुटि सुधार’ के नाम पर फर्जी आवेदन लगाकर नामांतरण किया जा रहा है, जिसमें स्थानीय पटवारी और कुछ जनप्रतिनिधियों की भूमिका संदिग्ध है। इसके बाद उक्त जमीन बाहरी लोगों को बेच दी जाती है।
मामले में पिथौरा उप पंजीयक ने अपनी सफाई में कहा कि वे केवल ऑनलाइन उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर रजिस्ट्री करते हैं और उन्हें रजिस्ट्री रोकने संबंधी कोई स्पष्ट आदेश प्राप्त नहीं हुआ था। हालांकि कलेक्टर कार्यालय से आदेश जारी होने की पुष्टि होने के बाद यह तर्क सवालों के घेरे में आ गया है।
कलेक्टर ने मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच के आदेश दिए हैं और स्पष्ट किया है कि यदि अनियमितता पाई जाती है तो संबंधित रजिस्ट्रियां निरस्त कर जमीन पुनः वास्तविक हितग्राहियों के नाम दर्ज की जाएगी।
गौरतलब है कि सरकार द्वारा गरीब किसानों को दी गई काबिल काश्त जमीन, जो उनके जीवनयापन का एकमात्र सहारा है, आखिर कैसे खरीदी-बिक्री के दायरे में आ गई? कलेक्टर के स्पष्ट आदेश के बावजूद रजिस्ट्री होना प्रशासनिक तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े करता है। क्या पिथौरा क्षेत्र में राजस्व व्यवस्था बेलगाम हो चुकी है? या फिर यह पूरा मामला संगठित भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है फिलहाल, सरीफाबाद के किसानों की नजर अब जांच और कार्रवाई पर टिकी है — ताकि उन्हें उनकी जमीन वापस मिल सके और दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो।


