सरीफाबाद जमीन मामला: गरीब किसानों की जमीन पर कथित खेल, राजस्व व्यवस्था पर गंभीर सवाल!
महासमुंद/पिथौरा। सरकारी दफ्तर में अपने काम के लिए आवाज उठाने वाला आम आदमी अगर किसी अधिकारी से ऊंची आवाज में बात कर दे, तो उस पर सरकारी काम में बाधा डालने का आरोप लगाकर कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। लेकिन जब सरकारी जमीन के कथित अवैध हस्तांतरण, दस्तावेजों में गड़बड़ी और गरीब किसानों के भूमि अधिकारों से जुड़े गंभीर आरोप सामने आते हैं, तब कार्रवाई की रफ्तार धीमी क्यों पड़ जाती है? जांच, नोटिस और निलंबन के बीच उलझे मामलों में अंतिम नतीजा आने में महीनों और सालों तक का वक्त क्यों लगता है? महासमुंद जिले के पिथौरा क्षेत्र के ग्राम सरीफाबाद का मामला इन्हीं सवालों को एक बार फिर सामने ला रहा है।
सरीफाबाद में कथित भूमि अनियमितताओं के तीन अलग-अलग मामले चर्चा में हैं। ग्रामीणों की शिकायतों में पटवारी राजेंद्र डोंगरे, जमीन कारोबार से जुड़े बताए जा रहे निखिल अग्रवाल और पुरुषोत्तम धृतलहरे की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं। इनमें पुरुषोत्तम धृतलहरे का नाम विशेष रूप से चर्चा में है। ग्रामीणों के आरोपों के अनुसार, वह किसानों पर जमीन बेचने का दबाव बनाने और उन्हें डराने-धमकाने के मामले में कथित रूप से शामिल रहा है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित व्यक्तियों की प्रतिक्रिया सामने आना अभी जरूरी है। तीन मामले, एक गांव और राजस्व व्यवस्था पर उठते सवाल।
पहला मामला: काबिल कास्त की जमीन की खरीदी-बिक्री
ग्रामीणों के अनुसार, सरीफाबाद में सरकारी काबिल कास्त की जमीन को कथित तौर पर गलत तरीके से दूसरे ग्रामीणों के नाम दर्ज कर उसकी खरीदी-बिक्री किए जाने की शिकायत करीब छह महीने पहले कलेक्टर से की गई थी। शिकायत में पटवारी हल्का नंबर 44 के राजेंद्र डोंगरे की भूमिका पर सवाल उठाए गए। मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्कालीन शिकायतों पर कलेक्टर विनय कुमार लंगेह के न्यायालय में संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर उपस्थित होने के निर्देश दिए जाने की बात सामने आई थी। ग्रामीणों का आरोप है कि जिन किसानों के भूमि अधिकार प्रभावित हुए, वे न्यायालय में उपस्थित हुए, लेकिन इस मामले में नाम सामने आए निखिल अग्रवाल की अनुपस्थिति के बीच प्रकरण का अंतिम नतीजा सामने नहीं आया। बताया जाता है कि इसके बाद मामला राजस्व मंडल, रायपुर में अपील के जरिए पहुंच गया।
दूसरा मामला: सरकारी तालाब को कृषि भूमि बताकर बेचने का आरोप
सरीफाबाद में दूसरा मामला सरकारी तालाब की जमीन से जुड़ा है। आरोप है कि तालाब की भूमि को कृषि भूमि बताकर निखिल अग्रवाल के नाम बेच दिया गया। इस मामले में भी पटवारी राजेंद्र डोंगरे की भूमिका पर सवाल उठे और प्रारंभिक जांच के बाद उन्हें निलंबित किए जाने की जानकारी सामने आई। अब सवाल यह है कि यदि जांच में अन्य व्यक्तियों की भूमिका भी सामने आती है, तो उनके संबंध में प्रशासन क्या कदम उठाता है?
तीसरे मामले ने पूरे प्रकरण को और गंभीर बना दिया है। आरोप है कि एक जीवित व्यक्ति को दस्तावेजों में मृत दर्शाकर कथित रूप से फर्जी कागजात तैयार किए गए और उसकी जमीन की खरीदी-बिक्री कर दी गई। इस मामले में भी निखिल अग्रवाल और राजेंद्र डोंगरे के नाम सामने आने का दावा किया जा रहा है। यदि दस्तावेजों की जांच में इन आरोपों की पुष्टि होती है, तो यह केवल जमीन के लेन-देन का विवाद नहीं, बल्कि भूमि अभिलेखों की विश्वसनीयता और राजस्व प्रक्रिया की निगरानी पर गंभीर सवाल होगा।
इस पूरे प्रकरण में पुरुषोत्तम धृतलहरे की कथित भूमिका सबसे अहम सवालों में से एक बनकर उभर रही है। ग्रामीणों के आरोप हैं कि वह पटवारी राजेंद्र डोंगरे के साथ मिलकर गरीब किसानों को डराने-धमकाने और उनकी जमीन बिकवाने के लिए दबाव बनाने में शामिल रहा। यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि वह पिथौरा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर जमीन की दलाली करता है और किसानों की मजबूरी का फायदा उठाता है।
ग्रामीणों के इन आरोपों की जांच कर सच्चाई सामने लाना प्रशासन की जिम्मेदारी है। यदि पुरुषोत्तम धृतलहरे की भूमिका के संबंध में शिकायतें और साक्ष्य उपलब्ध हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच क्यों नहीं होनी चाहिए? क्या संबंधित अधिकारियों ने अब तक उसकी भूमिका की जांच की है? क्या उसके बयान दर्ज किए गए हैं? क्या जमीन के दस्तावेजों और संबंधित लेन-देन की पड़ताल की गई है? इन सवालों का स्पष्ट जवाब सामने आना चाहिए। क्षेत्र के कुछ लोगों द्वारा उसे प्रभावशाली जनप्रतिनिधियों का संरक्षण मिलने की बात भी कही जा रही है। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है। प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि शिकायतों पर क्या कार्रवाई हुई और किन आधारों पर किसी व्यक्ति के विरुद्ध कार्रवाई की गई या नहीं की गई।
पटवारी निलंबित, लेकिन पूरे नेटवर्क की जांच कहां तक पहुंची?
राजस्व व्यवस्था में पटवारी से लेकर राजस्व निरीक्षक और पंजीयन कार्यालय तक की प्रक्रियाओं की अहम भूमिका होती है। जमीन के स्वामित्व, सीमांकन, नामांतरण और पंजीयन में किसी स्तर पर कथित गड़बड़ी हो जाए, तो उसका खामियाजा वर्षों तक वास्तविक भूमि स्वामियों को भुगतना पड़ सकता है। सरीफाबाद मामले में एक पटवारी के निलंबन की कार्रवाई सामने आई है, लेकिन निलंबन अपने आप में पूरे मामले का समाधान नहीं है। असली सवाल यह है कि कथित फर्जी दस्तावेज किसने तैयार किए? भूमि अभिलेखों में बदलाव की प्रक्रिया कैसे पूरी हुई? पंजीयन के दौरान किन दस्तावेजों का परीक्षण किया गया? यदि कई व्यक्तियों की भूमिका सामने आती है, तो क्या सभी की जिम्मेदारी तय की जा रही है? जांच का उद्देश्य केवल किसी एक कर्मचारी को निलंबित करना नहीं, बल्कि तथ्य सामने लाना, जिम्मेदारी तय करना और प्रभावित किसानों को नियमानुसार न्याय दिलाना होना चाहिए।
सरीफाबाद का मामला एक व्यापक सवाल खड़ा करता है। आम नागरिक अपने अधिकार के लिए सरकारी दफ्तर में आवाज उठाता है, तो उसे नियम-कानून का हवाला दिया जाता है। दूसरी ओर, भूमि अभिलेखों में कथित हेरफेर जैसे गंभीर आरोपों के मामलों में कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट होने में लंबा समय लग जाए, तो लोगों का व्यवस्था पर भरोसा कमजोर होता है। यह सवाल किसी को दोषी घोषित करने का नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने का है। यदि आरोप गलत हैं, तो जांच से यह स्पष्ट होना चाहिए। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। कानून की निष्पक्षता इसी में है कि शिकायतकर्ता, सरकारी कर्मचारी, जमीन कारोबारी या प्रभावशाली व्यक्ति—सभी के लिए एक ही प्रक्रिया और एक ही पैमाना लागू हो।
सरीफाबाद का मामला अब केवल कुछ जमीनों की खरीदी-बिक्री तक सीमित नहीं रह गया है। यह गरीब किसानों के भूमि अधिकार, सरकारी अभिलेखों की विश्वसनीयता और राजस्व प्रशासन की जवाबदेही से जुड़ा सवाल बन चुका है। मामले की चर्चा जिले से बाहर तक पहुंचने और राजधानी के पत्रकारों के यहां पहुंचने के बीच लोगों की नजर अब प्रशासन की अगली कार्रवाई पर है।


