महासमुंद। प्रधानमंत्री आवास योजना गरीब परिवारों को पक्का मकान देने का सबसे बड़ा सपना है, लेकिन महासमुंद जिले के महासमुंद ब्लॉक के 1240 परिवार आज इस सपने को अधूरा देख रहे हैं। कारण – इन परिवारों का मनरेगा जॉब कार्ड निरस्त कर दिया गया, जिसकी वजह से उन्हें मिलने वाली 20,000 रुपये मजदूरी सहायता बंद हो गई और उनके मकान आधे-अधूरे ही खड़े रह गए हैं।
गरीबों का घर अटका, जिम्मेदार विभाग मौन, यहाँ सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब प्रधानमंत्री आवास योजना स्वीकृत हुई, तब विभाग ने यह सुनिश्चित क्यों नहीं किया कि हितग्राही के पास सक्रिय जॉब कार्ड हो?
मनरेगा विभाग की जिम्मेदारी थी कि मजदूर परिवारों का जॉब कार्ड जीवित रखा जाए।
प्रधानमंत्री आवास विभाग की जिम्मेदारी थी कि जॉब कार्ड निरस्त होने की स्थिति में मकान निर्माण बाधित न हो।
जिला पंचायत और जनपद पंचायत की भूमिका थी कि इस गड़बड़ी पर समय रहते निगरानी रखते और समाधान निकालते।
बेबस हितग्राही की व्यथा
आज इसका जीता-जागता उदाहरण सामने आया, जब ग्राम पंचायत कौन्दकेरा के आश्रित ग्राम बंसीवनी की एक वयोवृद्ध महिला और ग्राम मूढ़ेना की एक महिला अपने अधूरे मकान के लिए मिलने वाली 20,000 रुपये की मजदूरी राशि दिलवाने की गुहार लेकर जनपद पंचायत महासमुंद के चक्कर काटती रहीं। दोनों महिलाओं ने मनरेगा शाखा से लेकर प्रधानमंत्री आवास शाखा तक अधिकारियों से मदद की अपील की, लेकिन अब तक केवल आश्वासन ही मिला है।
मनरेगा के अधिकारियों का कहना है कि हितग्राही योजना के तहत काम करने नहीं आ रहे थे, इस वजह से वर्क नंबर दर्ज नहीं हुआ और कार्ड निरस्त कर दिया गया। वहीं हितग्राही परिवारों का कहना है कि सरकार पूरे साल 12 महीने काम नहीं देती, मजबूरी में उन्हें शहर जाकर मजदूरी करनी पड़ती है। उनका सवाल है “बिना काम और बिना पैसे घर कैसे चले? अगर काम ही उपलब्ध नहीं होगा तो मनरेगा की शर्तें पूरी कैसे करें?”
लापरवाही या जानबूझकर अनदेखी?
जॉब कार्ड निरस्त करने से पहले विभागों ने यह नहीं देखा कि इससे गरीब हितग्राहियों का मकान अधूरा रह जाएगा। यह न केवल प्रशासनिक लापरवाही है, बल्कि सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी से भी भागना है।
अब सवाल उठता है कि क्या सरकार सिर्फ आंकड़ों में मकान स्वीकृत कर देने से अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेगी?
क्या जनपद पंचायत और रोजगार सहायकों की जिम्मेदारी नहीं बनती कि वे लाभुक के जॉब कार्ड और मजदूरी भुगतान पर निगरानी रखें?
1240 अधूरे घर इस बात की गवाही दे रहे हैं कि योजनाओं की जमीनी सच्चाई फाइलों से अलग है। गरीब परिवार पक्के मकान के लिए आज भी तरस रहे हैं और जिम्मेदार विभाग एक-दूसरे पर ठीकरा फोड़ रहे हैं।
प्रधानमंत्री आवास योजना “सबका सपना–घर हो अपना” का नारा तो देती है, लेकिन जब मनरेगा और पंचायत तंत्र की लापरवाही से गरीब का घर अधूरा रह जाए, तो यह नारा खोखला ही लगता है।
ग्रामीणों की मांग है कि जिला प्रशासन तत्काल जांच करे और जिन परिवारों के घर अधूरे रह गए हैं, उन्हें विशेष प्रावधान से मजदूरी राशि उपलब्ध कराई जाए। साथ ही, निरस्त किए गए जॉब कार्ड दोबारा चालू किए जाएं, ताकि गरीबों का सपना साकार हो सके।


