महासमुंद। शहर के संजय कानन स्थित बाबा भीमराव अंबेडकर मंगल भवन में आज कृषि विभाग द्वारा आयोजित किसान मेला किसानों के लिए सीखने का नहीं, बल्कि “भूख और बदइंतजामी” का अनुभव बन गया। जिले भर से बसों में भर-भरकर लाए गए सैकड़ों किसानों को इस मेले में न तो बैठने की जगह मिली, न खाने की व्यवस्था। स्थिति यह रही कि किसानों की बात तो छोड़िए, खुद क्षेत्र की सांसद रूपकुमारी चौधरी और महासमुंद विधायक योगेश्वर राजू सिन्हा तक को बिना दाल-सब्जी का भोजन करना पड़ा। दोनों जनप्रतिनिधियों को भी कड़ाही में परोसे गए चावल और बेस्वाद कढ़ी से दो-चार निवाले लेने पड़े।

सुबह से भूखे किसान, दोपहर में मिला सिर्फ “चना सब्जी” का सम्मान
कृषि विभाग ने किसानों को सुबह 6 बजे से ही गांव-गांव से बसों में भरकर बुला लिया था — वादे थे “जैविक खेती और उन्नत तकनीक सीखाने” के। लेकिन दोपहर ढाई–तीन बजे तक कार्यक्रम चला और तब जाकर भोजन की घोषणा हुई।
किसानों को उम्मीद थी कि मेहनतकशों के लिए कुछ सम्मानजनक व्यवस्था होगी, पर मेले में दाल, चावल, सब्जी तो क्या — चना सब्जी तक खत्म हो चुकी थी। एक किसान ने व्यंग्य में कहा लगता है कृषि विभाग हमें खेती नहीं, उपवास सिखाने बुलाया था।”
“नो कमेंट्स” कहकर भागे उप संचालक जब पत्रकारों ने उप संचालक कृषि श्री कश्यप से पूछा कि इतनी बड़ी भीड़ के लिए पर्याप्त व्यवस्था क्यों नहीं की गई, तो उन्होंने अद्भुत जवाब दिया, “यह कोई पूछने लायक बात है? भीड़ में अव्यवस्था तो हो जाती है।”
लेकिन जब पत्रकारों ने किसानों की थालियों में चावल तक न होने की हकीकत दिखाई, तो उप संचालक महोदय ने “नो कमेंट्स” कहकर मौके से रफूचक्कर हो गए।
विभाग की ‘व्यवस्था’ ने सरकार की ‘मंशा’ पर फेर दिया पानी राज्य सरकार किसानों को आत्मनिर्भर और उन्नत बनाने की बात करती है। लेकिन महासमुंद कृषि विभाग के अफसरों ने सरकारी मंशा को मजाक बना दिया है। लाखों रुपए के सरकारी फंड से “दिखावे के मेले”, और बदले में किसानों को चना-सब्जी की थाली — यह है जिले के कृषि विभाग की सफलता की कहानी!
मौके पर मौजूद भाजपा कार्यकर्ताओं ने कहा _ “राज्य सरकार करोड़ों रुपए किसानों की भलाई के नाम पर देती है, लेकिन विभाग के अधिकारी उसे ‘खाने’ में ही निपटा देते हैं।”
सवाल कई हैं, जवाब कोई नहीं…कृषि विभाग आखिर किसके लिए मेले करता है? किसानों के सम्मान के लिए या अधिकारियों की जेब गर्म करने के लिए? जब सांसद और विधायक तक को दाल नहीं मिली, तो किसान के हिस्से में क्या बचा? शायद अगली बार किसान मेला नहीं, “उपवास सम्मेलन” आयोजित किया जाएगा। जहां किसान सीखेंगे कि “भूखे रहकर भी मुस्कुराना कैसे है।


