महासमुंद। महासमुंद शहर से तुमगांव तक निर्माणाधीन सड़क अब ग्राम कौदकेरा के ग्रामीणों के लिए परेशानी का बड़ा कारण बनती जा रही है। सड़क निर्माण कार्य में लापरवाही और ठेकेदार की मनमानी के चलते गांव में हर समय धूल का गुबार छाया रहता है। सड़क से गुजरने वाले भारी वाहनों और निर्माण सामग्री से भरे ट्रकों के कारण हालात इतने खराब हो गए हैं कि ग्रामीणों का घरों से बाहर निकलना तक मुश्किल हो गया है।
ग्रामीणों का आरोप है कि सड़क निर्माण का जिम्मा संभाल रही जे डी कंस्ट्रक्शन कंपनी द्वारा नियमों की खुलेआम अनदेखी की जा रही है। निर्माण स्थल और गांव के बीच पानी का छिड़काव नहीं किया जा रहा, जिससे सड़क पर उड़ने वाली धूल सीधे घरों और खेतों तक पहुंच रही है। गांव के बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं को सांस लेने में तकलीफ, आंखों में जलन तथा खांसी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
कौदकेरा के किसानों ने बताया कि धूल के कारण खेतों में लगी फसलों पर भी विपरीत असर पड़ रहा है। फसलों की पत्तियों पर धूल जमने से उनकी वृद्धि प्रभावित हो रही है। वहीं पशुओं के लिए भी यह स्थिति नुकसानदायक साबित हो रही है। ग्रामीणों का कहना है कि कई बार संबंधित विभाग और प्रशासनिक अधिकारियों से शिकायत की गई, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
ग्रामीणों में इस बात को लेकर भी नाराजगी है कि जिले के वरिष्ठ अधिकारी प्रतिदिन इसी मार्ग से आवाजाही करते हैं, लेकिन उन्हें गांव की समस्याएं नजर नहीं आतीं। ग्रामीणों का आरोप है कि अधिकारी ठेकेदार के प्रभाव में हैं और शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा। लोगों का कहना है कि यदि अधिकारी वास्तव में निरीक्षण करें तो निर्माण कार्य में हो रही अनियमितताएं सामने आ सकती हैं।
ग्रामीणों ने बताया कि जब भी कोई ट्रक या भारी वाहन गांव से गुजरता है, तब पूरे क्षेत्र में धूल का घना गुबार उठता है। घरों के भीतर तक धूल भर जाती है और लोगों को दरवाजे-खिड़कियां बंद रखने पड़ते हैं। इससे दैनिक जीवन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।
गांववासियों ने प्रशासन से मांग की है कि सड़क निर्माण कार्य में तत्काल सुधार कराया जाए। नियमित रूप से पानी का छिड़काव कराया जाए, निर्माण सामग्री को ढंककर ले जाया जाए तथा गांव क्षेत्र में वाहनों की गति नियंत्रित की जाए। साथ ही निर्माण एजेंसी की कार्यप्रणाली की जांच कर दोषियों पर कार्रवाई की जाए।
ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द समस्या का समाधान नहीं किया गया तो वे आंदोलन का रास्ता अपनाने को मजबूर होंगे। अब देखना यह है कि प्रशासन ग्रामीणों की पीड़ा सुनता है या फिर धूल के गुबार में उनकी आवाज दबकर रह जाएगी।


