Wednesday, 30 Sep 2026

सरीफाबाद की जमीन पर ‘खेल’! गरीब किसानों की काबिल काश्त जमीन कैसे पहुंची दलालों के हाथ?

महासमुंद। पिथौरा तहसील के ग्राम सरीफाबाद में काबिल काश्त भूमि के नाम पर हुए जमीन हस्तांतरण और खरीद-बिक्री का मामला अब राजधानी रायपुर तक पहुंच गया है। मामले को लेकर प्रकाशित समाचार में किसानों की जमीन के राजस्व रिकॉर्ड में कथित बदलाव, दूसरे लोगों के नाम जमीन दर्ज कराने और उसके बाद बिक्री किए जाने के आरोप सामने आए हैं। मामले में पटवारी, आरआई और पंजीयन प्रक्रिया की भूमिका पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। करोड़ों की जमीन फर्जी तरीके से बेच कर करोड़ों कि काली कमाई की गई है। निखिल अग्रवाल ने सरीफाबाद में कई जमीन पटवारी आर आई के साथ मिलकर खरीदी बिक्री की है, कुछ मामले अभी प्रकाश में नहीं आए हैं जिसे बहुत जल्दी है जनता के सामने लाया जाएगा और इस पूरे गोरख धंधे का पर्दाफाश भी किया जाएगा।

गौरतलब है कि वर्ष 1978 में शासन की ओर से खेती के लिए मिली जमीन पर नौ किसान और उनके परिवार लंबे समय से काबिज हैं। किसानों का दावा है कि वे लगातार उक्त जमीन पर खेती करते आ रहे हैं और उनके पास पुराने राजस्व दस्तावेज एवं ऋण पुस्तिका भी मौजूद हैं। इसके बावजूद राजस्व रिकॉर्ड में पटवारी, आर आई के द्वारा बदलाव के बाद उनकी जमीन दूसरे लोगों के नाम दर्ज हुई और बाद में उसकी खरीद-बिक्री कर दी गई।

किसानों के अनुसार 30 एकड़ से अधिक भूमि की खरीद-बिक्री विवाद के घेरे में है, जबकि करीब 150 एकड़ भूमि में इसी तरह की गड़बड़ी की आशंका जताई जा रही है। मामला महासमुंद कलेक्टर विनय कुमार लंगेह के न्यायालय में पहुंचा था। किसानों का आरोप है कि मामला कलेक्टर न्यायालय में शुरू होने के बाद जमीन कारोबारी निखिल अग्रवाल के प्रयास से राजस्व मंडल की रायपुर सर्किट कोर्ट तक पहुंच गया।

पटवारी राजेंद्र डोंगरे ने जमीन बेचने किसानों पर बनाया था दबाव?

किसानों ने हल्का नंबर 44 के तत्कालीन पटवारी राजेंद्र डोंगरे पर गंभीर आरोप लगाए हैं। किसान फिरत के अनुसार पटवारी द्वारा उन्हें जमीन बेचने के लिए दबाव बनाया गया था। आरोप है कि जमीन बेचने से इनकार करने के बाद त्रुटि सुधार के नाम पर जमीन दूसरे लोगों के नाम दर्ज कराने की बात कही गई और बाद में ऐसा ही हुआ।

किसानों का यह भी आरोप है कि सरीफाबाद से लगे ग्राम सानटेमरी के कुछ लोगों से कथित आवेदन लगवाकर राजस्व रिकॉर्ड में जमीन उनके नाम दर्ज कराई गई और बाद में जमीन की बिक्री कर दी गई। किसानों का दावा है कि वास्तविक कब्जाधारियों ने न तो अपनी जमीन बेची और न ही उन्हें इसकी जानकारी थी। खरीद-बिक्री की जानकारी मिलने के बाद उन्होंने कलेक्टर जनदर्शन में शिकायत की। मामले की जांच के दौरान पटवारी राजेंद्र डोंगरे को सरीफाबाद हल्का नंबर से हटा दिया गया था।

धनसाथ और फिरत ने बताई अपनी जमीन की स्थिति

किसान धनसाथ के मुताबिक शासन से उसे 2 एकड़ 15 डिसमिल जमीन मिली थी। उसके पास ऋण पुस्तिका भी है, लेकिन उसका कहना है कि रिकॉर्ड में जमीन की स्थिति बदलने के बाद अब वह जमीन बिक्री के विवाद में आ गई है। वहीं किसान फिरत का दावा है कि उसके नाम दर्ज 2 एकड़ 15 डिसमिल जमीन में से अब केवल करीब 80 डिसमिल भूमि ही बची है और शेष भूमि निखिल अग्रवाल के नाम दर्ज हो गई है।

किसानों का आरोप है कि वन व्यवस्थापन पट्टा, त्रुटि सुधार और राजस्व रिकॉर्ड में बदलाव की प्रक्रिया का इस्तेमाल कर जमीन दूसरे लोगों के नाम दर्ज की गई। उनका कहना है कि यदि राजस्व रिकॉर्ड में भूमि की बिक्री अयोग्य स्थिति दर्ज थी, तो उसकी रजिस्ट्री और नामांतरण किस आधार पर किया गया, इसकी जांच होनी चाहिए।

विधायक संपत अग्रवाल का बयान भी चर्चा में

*इस पूरे मामले में बसना विधायक संपत अग्रवाल का बयान भी चर्चा में है। प्रकाशित समाचार के अनुसार जमीन कारोबारी निखिल अग्रवाल विधायक से मुलाकात कर मामले में सहयोग मांगने पहुंचे थे। विधायक संपत अग्रवाल ने कथित तौर पर किसी प्रकार की मदद करने से इनकार करते हुए स्पष्ट किया कि मामले में राजस्व विभाग के नियम-कायदों के अनुसार ही कार्रवाई होनी चाहिए।*

अब किसानों की निगाहें राजस्व मंडल की कार्यवाही और प्रशासनिक जांच पर टिकी हैं। किसानों की मांग है कि वर्ष 1978 से लेकर वर्तमान तक के मूल राजस्व रिकॉर्ड, खसरा-पंचसाला, ऋण पुस्तिका, नामांतरण आदेश, त्रुटि सुधार आदेश, कथित आवेदनों और रजिस्ट्री दस्तावेजों की जांच कर यह स्पष्ट किया जाए कि जमीन किस आधार पर दूसरे लोगों के नाम दर्ज हुई और उसकी बिक्री कैसे हुई।

Share This Article

- Advertisement -

error: Content is protected !!