महासमुंद। देशभर में महिला एवं बाल विकास विभाग की रीढ़ मानी जाने वाली आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएं आज भी मानदेय विसंगति की बड़ी समस्या से जूझ रही हैं। एक ही केंद्रीय योजना के तहत काम करने के बावजूद अलग-अलग राज्यों में मिलने वाले मानदेय में भारी अंतर देखने को मिल रहा है। कहीं आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को 15 से 20 हजार रुपए तक मानदेय मिल रहा है, तो कई राज्यों में आज भी महिलाएं महज 4 से 5 हजार रुपए प्रतिमाह में काम करने को मजबूर हैं।
आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से गर्भवती महिलाओं, बच्चों और किशोरियों के स्वास्थ्य, पोषण और प्रारंभिक शिक्षा से जुड़े कार्य किए जाते हैं। इसके अलावा टीकाकरण अभियान, सर्वे, पोषण ट्रैकिंग, डेटा एंट्री और विभिन्न सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में भी इन कार्यकर्ताओं की अहम भूमिका रहती है। इसके बावजूद अधिकांश राज्यों में इन्हें नियमित कर्मचारी का दर्जा नहीं मिला है और केवल “मानदेयभोगी कार्यकर्ता” मानकर काम लिया जा रहा है।
केंद्र सरकार ने वर्ष 2018 से आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के लिए 4500 रुपए, मिनी आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के लिए 3500 रुपए और सहायिका के लिए 2250 रुपए प्रतिमाह का आधारभूत मानदेय तय किया था। इसके ऊपर राज्य सरकारें अपने स्तर पर अतिरिक्त राशि जोड़ती हैं। यही कारण है कि अलग-अलग राज्यों में मानदेय का स्वरूप पूरी तरह बदल जाता है।
वर्तमान आंकड़ों के अनुसार गोवा, हरियाणा, केरल, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को 13 हजार से 20 हजार रुपए तक कुल मानदेय दिया जा रहा है। हरियाणा में कार्यकर्ताओं को लगभग 14 हजार रुपए तक और सहायिकाओं को करीब 8 हजार रुपए तक राशि मिल रही है। वहीं गोवा में अनुभव और श्रेणी के आधार पर यह राशि और अधिक बताई जा रही है।
छत्तीसगढ़, बिहार, उत्तरप्रदेश, पंजाब और राजस्थान जैसे राज्यों में कार्यकर्ताओं को लगभग 8 से 12 हजार रुपए तक मानदेय मिल रहा है। छत्तीसगढ़ में कार्यकर्ताओं को करीब 10 से 12 हजार रुपए और सहायिकाओं को 5 से 6 हजार रुपए प्रतिमाह दिए जाने की जानकारी सामने आई है। दूसरी ओर कुछ राज्यों में अभी भी केंद्रीय राशि के बराबर या उससे थोड़ा अधिक भुगतान ही किया जा रहा है। ऐसे राज्यों में कई आंगनबाड़ी सहायिकाओं का मानदेय 3 से 4 हजार रुपए प्रतिमाह तक सीमित है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति “एक देश-एक योजना, लेकिन अलग-अलग वेतन व्यवस्था” की तस्वीर पेश करती है। कई राज्यों में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का मानदेय न्यूनतम मजदूरी से भी कम है, जबकि उनका कार्यभार लगातार बढ़ता जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में कई महिलाएं अपने निजी खर्च से मोबाइल रिचार्ज, इंटरनेट और यात्रा खर्च उठाकर सरकारी डेटा अपलोड करने को मजबूर हैं।
आंगनबाड़ी संगठनों का कहना है कि सरकारें उन्हें कर्मचारी की तरह काम तो देती हैं, लेकिन कर्मचारी जैसी सुविधाएं नहीं देतीं। अधिकांश कार्यकर्ताओं को पेंशन, भविष्य निधि, स्वास्थ्य बीमा और सामाजिक सुरक्षा जैसी सुविधाओं का लाभ नहीं मिलता। इसी वजह से विभिन्न राज्यों में समय-समय पर आंदोलन और हड़ताल की स्थिति भी बनती रही है।
महिला एवं बाल विकास से जुड़े जानकारों का कहना है कि यदि सरकार वास्तव में कुपोषण और मातृ-शिशु स्वास्थ्य सुधार को प्राथमिकता देना चाहती है, तो आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं को सम्मानजनक मानदेय, सामाजिक सुरक्षा और स्थायी कर्मचारी जैसी सुविधाएं देना आवश्यक होगा। वर्तमान परिस्थितियों में लाखों महिलाएं कम मानदेय में बड़ी जिम्मेदारियां निभा रही हैं, जो व्यवस्था की गंभीर विसंगति को उजागर करता है।


