Friday, 9 Oct 2026

समिति और बीज निगम में एक ही रकबे की धान, दो जगह बिक्री? साठगांठ के बिना बिक्री नहीं हो सकती संभव

एग्रीस्टैक और ऑनलाइन पोर्टल के बावजूद हो गया फर्जीवाड़े? कैसे

महासमुंद। जिले में धान खरीदी को पारदर्शी बनाने के लिए ऑनलाइन पंजीयन और एग्रीस्टैक जैसी व्यवस्थाएं लागू हैं, इसके बावजूद धान की कथित दोहरी बिक्री का मामला सामने आया है। बागबाहरा ब्लॉक के कोमाखान क्षेत्र के ग्राम देवरी में दो किसानों पर छत्तीसगढ़ राज्य बीज एवं कृषि विकास निगम और सहकारी समिति, दोनों जगह धान बेचने का आरोप लगाते हुए महासमुंद कलेक्टर से शिकायत की गई है। शिकायत ने खरीदी व्यवस्था में संभावित मिलीभगत और सरकारी राशि के दुरुपयोग पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

*किसानों के नाम सामने आए*

शिकायत के अनुसार ग्राम देवरी निवासी रुक्मणी चंद्राकर (पति मदन चंद्राकर) और कमला बाई चंद्राकर (पति जीवन लाल चंद्राकर) ने देवरी सहकारी समिति के साथ-साथ बीज निगम में भी धान बेचा है। शिकायतकर्ता का कहना है कि यदि एक ही उत्पादन निर्धारित सीमा से अधिक मात्रा में अलग-अलग सरकारी संस्थाओं में बेचा गया है, तो यह गंभीर अनियमितता है और इसकी जांच जरूरी है।

नियम क्या कहते हैं

खाद्य विभाग के अनुसार धान बेचने के लिए एग्रीस्टैक पोर्टल पर पंजीयन आवश्यक है और 2025-26 के लिए ऑनलाइन सोसायटी मॉड्यूल भी संचालित है। शासन के दिशा-निर्देशों में स्पष्ट है कि प्रमाणित बीज उत्पादन कार्यक्रम लेने वाले किसान यदि सामान्य धान भी समितियों में बेचते हैं, तो दोनों जगह की कुल बिक्री उनके कुल धारित रकबे की सीमा से अधिक नहीं होनी चाहिए। इस मात्रा का मिलान मार्कफेड और बीज निगम के समन्वय से किया जाना है। यानी दोनों जगह बिक्री अपने आप में हमेशा प्रतिबंधित नहीं है, लेकिन कुल मात्रा का तय सीमा से ज्यादा होना गंभीर सवाल खड़ा करता है।

शिकायतकर्ता का आरोप है कि समिति के पोर्टल और रिकॉर्ड में किसान की बिक्री का विवरण उपलब्ध रहता है। ऐसे में निर्धारित सीमा से अधिक धान स्वीकार किया गया है तो केवल किसानों की भूमिका की जांच पर्याप्त नहीं होगी। जांच में ये बिंदु अहम है किसान ने बीज निगम और समिति में कितना-कितना धान बेचा। कुल कृषि रकबा और गिरदावरी में दर्ज उत्पादन। दोनों बिक्री की तारीखे दोनों संस्थाओं के पोर्टल की जानकारी का मिलान किस स्तर पर हुआ।

शिकायत में कहा गया है कि दोहरी बिक्री से शासन को आर्थिक नुकसान हुआ और संबंधित लोगों ने अनुचित लाभ उठाया। हालांकि नुकसान की वास्तविक राशि रिकॉर्ड मिलान और जांच के बाद ही स्पष्ट होगी। इसके लिए बीज निगम की खरीदी, समिति की खरीदी, रकबा, गिरदावरी और भुगतान का पूरा डिजिटल रिकॉर्ड खंगालना जरूरी बताया गया है। आरोप प्रमाणित होने पर किसानों के साथ-साथ धान स्वीकार करने वाली व्यवस्था के जिम्मेदार अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका भी तय की जानी चाहिए।

मामला केवल दो किसानों का नहीं, बल्कि सरकार के डिजिटल निगरानी तंत्र की प्रभावशीलता का भी है। सवाल उठ रहा है कि जब पोर्टल पर सारी जानकारी उपलब्ध थी, तो कथित दोहरी बिक्री किस स्तर पर हो गई। क्या सिस्टम में खामी थी या रिकॉर्ड जांचने वालों ने जानबुझ कर अनदेखी की? अब यह सवाल जिला प्रशासन के सामने है। पारदर्शिता का दावा तभी सार्थक होगा, जब बीज निगम और समिति के रिकॉर्ड का आमने-सामने मिलान कर यह साफ किया जाए कि कितना धान बेचा गया और नियमों के उल्लंघन की स्थिति में जिम्मेदारी किसकी है।

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